आपके पिता जी ने आपको लगभग 5-6
वर्ष की आयु में लक्की मरवत् की माध्यमिक पाठशाला में शिक्षा के लिए भेजा।
आपकी प्रकृति अल्पायु से ही संसार एवं सांसारिक जंजाल से तटस्थ रहने की थी, फिर
भी आत्मिक उन्नति के साथ-साथ शारीरिक एवं लौकिक उन्नति को आप महत्त्व
प्रदान करते थे। इसलिए आपने अधिक आनाकानी न करते हुए इस शिक्षा को सन् 1911 ई 0
तक उर्दू तथा फ़ारसी भाषा में ग्रहण किया। इसके साथ हिन्दी व पंजाबी की
भाषा का पंडित धनीराम जी से ज्ञान प्राप्त किया। आपकी अत्यधिक रुचि सन्त
महापुरुषों के सत्संग तथा सेवा की ओर थी। यह सत्त्वगुण प्रधान स्वभाव तथा
ऐसी धार्मिक प्रवृत्तियां बचपन से ही आपके अवतारी महापुरुष होने की प्रमाण
थीं। इतनी छोटी आयु में श्रद्धा तथा भक्ति की भावनाओं को देखकर आपके पड़ोस
में रहनेवाले विद्वान् पंडित धनीराम जी ने आपको सनातन ग्रन्थों का
स्वाध्याय करने, नित्यकर्म पाठ और
गायत्री सुमिरण की ओर प्रेरित किया। आप उनकी बात मानकर पहले से भी अधिक
श्रद्धा से ये सब करने लगे। आपकी इस नित्य-कर्म और पाठादि से मानसिक
सन्तुष्टि न होती थी। आप प्राय: सोचा करते थे कि सच्चा उपदेश तथा भजन तो
कुछ और ही है, जिससे मन को शान्ति तथा
आत्मिक सुख प्राप्त होता है। फिर भी आपकी तुलसीकृत रामायण पढ़ने में अत्यधिक
रुचि थी। जहां भी श्री रामायण के पाठ के विषय में सुनते; नींद, आराम, भोजन
की सुधि भुलाकर वहां पहुँच जाते। वहां पहुँचकर बड़े ध्यान से श्रद्धापूर्वक
प्रेमसहित श्री रामायण के पाठ का रसपान करते तथा आनन्दमग्न हो जाते। आपकी
ऐसी उच्च भावनाओं को देखकर विद्वान् पंडित जी के ह्मदय में आपके लिए असीम
आदर का भाव जग गया था और पंडित जी को बहुधा यह कहते हुए सुना गया कि ""आप
किसी उच्च उद्देश्य को लेकर प्रकट हुए हैं। आप कोई साधारण व्यक्ति नहीं, अपितु कोई चमत्कारी विभूति हैं।'' आपने उन आदर्शों को स्थापित किया, जिनपर
चलकर सर्वसाधारण भी अपना कल्याण कर सकें। एक अलौकिक शक्ति-सम्पन्न होते
हुए भी आपने उन आदर्शों को अपनाया जो जनसाधारण के लिए मार्ग बन सकें।
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