श्री दूसरी पादशाही जी से भेंट
जन मानस में भर जाय, भक्ति का उजियारा ।
फँसे जीव न विकट माया में, उतरें भवजल पारा ।।
युग युगों तक बहे धरा पर, अमर सत्य की धारा ।
बन्धन मुक्त कराने को, प्रकटैं सर्गुण अवतारा ।।
इसलिए प्रकृति के अटल सिद्धान्तानुसार-
युगों युगों से चलता आता, गुरु शिष्य का नाता ।
कृपा करें अधिकारी शिष्य पर, पूर्ण सद्गुरु दाता ।।
सतगुरु स्वयं आत्म-प्रकाशी, पूर्ण तत्त्व ज्ञाता।
पूर्ण शिष्य निज रूप बनावें, गुण सम्पन्न सुजाता ।।
जन मानस में भर जाय, भक्ति का उजियारा ।
फँसे जीव न विकट माया में, उतरें भवजल पारा ।।
युग युगों तक बहे धरा पर, अमर सत्य की धारा ।
बन्धन मुक्त कराने को, प्रकटैं सर्गुण अवतारा ।।
इसलिए प्रकृति के अटल सिद्धान्तानुसार-
युगों युगों से चलता आता, गुरु शिष्य का नाता ।
कृपा करें अधिकारी शिष्य पर, पूर्ण सद्गुरु दाता ।।
सतगुरु स्वयं आत्म-प्रकाशी, पूर्ण तत्त्व ज्ञाता।
पूर्ण शिष्य निज रूप बनावें, गुण सम्पन्न सुजाता ।।
ये
वही दिन थे जबकि श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पादशाही जी की आज्ञानुसार
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी (साधू वेष में) लक्की
मरवत् में सत्संग-प्रचार के लिए पधारे। भक्त साहिबराम जी ने आप (श्री
सद्गुरुदेव जी महाराज श्री तीसरी पादशाही जी) को कहा कि आज रात को हमारे घर
सत्संग होगा। आप भी प्रसन्नतापूर्वक रात्रि समय भक्त जी के घर पहुँचे।
महान
आत्माओं का परस्पर पुराना सम्बन्ध हुआ करता है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
श्री दूसरी पादशाही जी उस समय सत्संग कर रहे थे जबकि आप भक्त साहिबराम जी
के घर गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने दिव्य दृष्टि से पारमार्थिक कार्य
करने वाले शिष्य को पहचान लिया। आपने भी आन्तिक आनन्द के दाता पूर्ण
सद्गुरु को प्राप्त कर लिया। यही वांछित संयोग नियति ने बना दिया। श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने पारमार्थिक कार्य करने वाले बहुमूल्य रत्न को पाकर
हार्दिक स्नेह प्रदर्शित किया। इधर आपने भी अपने सच्चे सद्गुरु से मिलकर
उनके श्री चरणों में अगाध प्रेम का सम्बन्ध जोड़ कर अपनी चिरकाल की आत्मा
को तृप्त किया। पुरातन रीति के अनुसार आपने अनन्य शिष्य बनकर श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी से रूहानी धन (नाम-उपदेश) प्राप्त किया। श्री
अनाथदास जी ने गुरु-शिष्य के सम्बन्ध में लिखा है-
सूर दर्श आदर्श ज्यों, होत अगन अद्योत ।
तैसे गुरु प्रसाद से, अनुभव निर्मल होत ।।
जिस
प्रकार आतिशी शीशे पर सूर्य की किरणें पड़ने से उसमें अग्नि उत्पन्न करने
की शक्ति आ जाती है, इसी प्रकार ही गुरु की कृपा से शिष्य का अनुभव निर्मल
हो जाता है। अर्थात गुरुदेव सूर्य हैं तो शिष्य आतिशी शीशा बनकर गुरुदेव से
आत्मिक शक्ति रूपी धन पाकर शक्तिशाली बन जाता है। ऐसा केवल पूर्ण शिष्य
अर्थात गुरुदेव जी की प्रसन्नता प्राप्त करने वाला शिष्य ही कर सकता है।
इसी प्रकार आपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की सेवा में सर्वस्व समर्पण कर
आत्मिक धन प्राप्त किया।
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