उन
श्रद्धालुओं में से एक ख़ान साहिब कैकाबाद जी (पारसी) और उनकी सुपुत्री
प्रवीण आपके प्रति अति श्रद्धालु थे। खान साहिब उस समय की ब्रिटिश
गवर्नमेंट की ओर से अति उच्च पद पोलिटिकल एजेण्ट की पदवी पर नियुक्त थे। आप
जब भी कोयटा में पधारते तो ख़ान साहिब अपनी सुपुत्री सहित कोयटा रेलवे
स्टेशन पर आकर आपको निवास स्थान पर ले जाते और जब तक कोयटा में निवास करते,
वे प्रतिदिन सांय समय आपको अपनी मोटर कार में बाहर सैर के लिए ले जाते तथा
श्री दर्शन का लाभ उठाते। जब आप कोयटा से प्रस्थान करते तो ख़ान साहिब
रेलवे स्टेशन पर पहुँचाने तक आपकी सेवा में उपस्थित रहते।
एक बार आपको कोयटा से अन्य स्थान पर पधारने के दिन ख़ान साहिब जी एक
आवश्यक सरकारी काम में उलझे हुए थे। वे समय पर स्टेशन न पहुँच सके, परन्तु
उनके मन में अत्यधिक व्याकुलता थी। अतः वे कार्य को बीच में ही छोड़ कर
रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। ख़ान साहिब जी ने रेलवे प्लेटफार्म पर पांव रखा ही
था कि गाड़ी ने चलने की सीटी दी। ख़ान साहिब जी उन्मत्त होकर उस डिब्बे की
ओर भागे, जिसमें आप विराजमान थे। ख़ान साहिब जी जैसे भागते हुए दिखाई दिये
तो गार्ड ने उन्हें देखते ही गाड़ी रोक दी और वे आपके पास पहुँच गए और
उन्होंने श्री चरणों को स्पर्श कर अपने आपको कृतार्थ किया। ख़ान साहिब जी
को प्लेटफार्म पर भागते हुए देखकर उस समय वहां जितने लोग उपस्थित थे, सभी
चकित हो गए कि इतने ऊँचे पद के अधिकारी साधारण मनुष्यों की भाँति कहां
भागे जा रहे हैं। उस समय ख़ान साहिब जी को किसी की भी चिन्ता न थी। जो
मनुष्य अपने रुहानी राहनुमा जिनसे कि उसको आत्मिक शान्ति प्राप्त हुई हो और
फिर वह अपने मालिक से बिछुड़ रहा हो, भला ऐसे मालिक के दर्शन और
चरण-स्पर्श करने के लिए जाते समय किसी अन्य ओर ध्यान कैसे जा सकता है।
सत्य तो है कि सच्चे प्रेमी को अपने प्रियतम के अतिरिक्त कुछ भी अच्छा
नहीं लगता। वह उनके प्रेम में इतना आनन्द विभोर हो जाता है कि उसे उस
आन्तिरक आनन्द तथा वास्तविक प्रेम में दुनियावी मान-अपमान, हानि -लाभ सब
मिथ्या दिखाई देते हैं। ख़ान साहिब जी भी इसी सच्चे प्रेम के रंग में रंगे
हुए थे, जिसका स्पष्ट रूप लोगों के सामने स्वयं प्रकट हो गया। गाड़ी में
आपने अपने प्रेमी की आतुरता को मिटाने के लिए दो-तीन श्री अमृत वचन भी
फ़रमाए। प्रेमी ने चरण-स्पर्श भी किया और एक क्षण श्री दर्शन तथा श्री अमृत
वचनों का पान भी कर लिया। पुनः गाड़ी चल पड़ी और ख़ान साहिब जी बिना किसी
ओर ध्यान दिए अपने काम पर लौट आए।
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