Wednesday, June 15, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज- साधु वेष


श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के हृदय में नाम-उपदेश की अमर ज्योति का प्रकाश स्थान-स्थान पर फैलाने की एक तरंग उठी। इस लहर ने सन् 1920 में लक्की मरवत् में साकार रूप धारण किया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने कुछ अधिकारी गुरुमुखों को साधु-वेष देकर लक्की मरवत् में एक साधु-मण्डली तैयार की। उनमें से कुछ महात्मा जनों को सत्संग उपदेश कार्य के लिए विभिन्न स्थानों पर भेजा। साथ में यह आज्ञा भी दी कि सद्गुरु के नाम पर सत्संग उपदेश देकर अधिकारी आत्माओं को परमार्थ-लाभ कराओ।
उन्हीं दिनों में स्थान लक्की मरवत् में ही सन् 1920 में आपको साधू वेष प्रदान कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने आपका शुभ नाम श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी रखा। आपके हृदय में प्रेम का सागर हिलोरें लेने लगा। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने आपको भी सत्संग-उपदेश की सेवा फ़रमाई। साथ में यह वचन फ़रमाए - ''आप फोर्टसन्टेमन, बिलोचिस्तान तथा सिन्ध को चिताने के लिए जाओ। वहां पर अपने ही नाम पर सत्संग-उपदेश दो। कुछ लोग इस विषय पर आपत्ति करेंगे, लेकिन आप उनकी ओर तनिक भी ध्यान न देना।'' आपको श्री सद्गुरुदेव महाराज जी का वियोग असह्य था। श्री प्रन्नता तथा श्री मौज को प्राप्त करने के लिए आपने श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर वैसा ही किया। श्री आज्ञा थी कि अपने नाम पर परमार्थ-लाभ कराओ। इतनी शीघ्र इतना ऊँचा पद मिल जाने पर भी आपके हृदय में अपने पद का ख़्याल उत्पन्न न हुआ।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने आपको सिन्ध भेजते समय फ़रमाया कि कलियुग के जीव निर्बल हैं, वे अपने कर्मों से नहीं, अपितु सद्गुरु की कृपा से पार हो सकते हैं। इसलिए जो भी आपसे नाम का दान मांगे, उसे उदारता के साथ नाम-दान प्रदान करना है। यह जो सत्य नाम है कभी निष्फल नहीं जाता। चाहे एक दिन में, चाहे एक वर्ष में, चाहे इससे भी अधिक समय में अपना फ़ल ज़रूर देता है। नाम रूपी बीज जीव के हृदय में अवश्य ही अंकुरित होता है और अवश्य ही होगा। आप इस नाम के अमृत को जन-जन को पिलायें। हमारा आशिर्वाद आपके साथ है।
      आप नम्रता से श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की आज्ञानुसार परमार्थ की अनन्त यात्रा पर निकल पड़े। इसके आन्तरिक रहस्य को तो केवल श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ही जानते थे। अतः उन्होंने आरम्भ से ही आपको ऐसी श्री आज्ञा प्रदान की।

No comments:

Post a Comment