अब
आप अधिकतर समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की सेव-संगति में व्यतीत करने
लगे। सन् 1916 में आपने गुरु-दीक्षा की परम्परा को पूरा किया। आपने श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी से सुरत-शब्द-योग का उपदेश लिया तो आपके मन में नये
प्रकार की शान्ति तथा आनन्द का अनुभव हुआ, जिस सच्चे आनन्द की प्राप्ति की
खोज में आप थे। आप गुरु-दीक्षा से पहले कईं बार फरमाया करते थे कि 'सच्चा
आनन्द, सच्ची खुशी' कुछ और है। जैसे मकरन्द का लोभी भ्रमर पुष्पों का रस
पीते हुये तृप्त नहीं होता, इसी प्रकार आप श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की
पावन संगति तथा भजनाभ्यास के अमृत-स्त्रोत से अमृत पीते हुए तृप्त न होते।
हर समय एक निराली मस्ती में खोये हुए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री
दर्शनों के इच्छुक रहते थे।
इस समय आप युवावस्था में पदार्पण कर चुके थे। शरीर पर यौवन था, परन्तु मन
में वासनाएं नहीं थी। शरीर सुन्दर, सुडौल, कान्तिमय था, किन्तु संसार के
सुख-ऐश्वर्यों की ओर से मन उपराम था। सांसारिक गृहस्थ का विचार आपको
आकर्षित न कर पाया। उभरते यौवन काल में जबकि जनसाधारण जगत के भोग-ऐश्वर्य
के मतवाले होते हैं, आपको इस जगत से कोई सरोकार न था, हालांकि घर धन-धान्य
सम्पन्न था और सब सुख-ऐश्वर्य आपके पीछे-पीछे फिरते थे। पूर्ण
सन्त-महापुरुष श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के मिलन तथा शुभ संगति ने सोने पर
सुहागे का काम किया। फलस्वरूप आपके चित्त में प्रेम-भक्ति-परमार्थ की
भावनाएँ उमड़ पड़ीं। चकमक को रगड़ने पर, पारस को लोहे से छूने पर जो दशा
होती है, वही दशा आपकी हो गई। जिस महान् एवं उच्चतम उद्देश्य की पूर्ति के
लिए आप जगत में अवतरित हुए थे, उसी की सत्प्रेरणा आपके हृदय में होने लगी।
No comments:
Post a Comment