एक
दिन क्या हुआ कि रात्रि के समय वही भक्त नींद से उठा और आपको पलंग पर
विश्राम न करते हुए देखकर चकित हो गया। इधर-उधर देखकर वह सोचने लगा कि
महापुरुषों की लीला अपार होती है, गये होंगे किसी प्रेमी का गृह कृतार्थ
करने। आपके आने की राह देखते-देखते उसे नींद आ गई। इस प्रकार निरन्तर तीन
चार रात्रि इस प्रकार हुआ कि उसकी नींद खुल जाती और वह उठकर देखता तो आप
पलंग पर विश्रम करते हुए दिखाई न देते। प्रातः उठने पर आपको पलंग पर
विराजमान पाता। उसके मन पर उत्कण्ठा उत्पन्न हुई कि रात्रि समय आप कहाँ
जाते हैं?
इसके
दूसरे दिन वह रात्रि काल में जागता रहा। जब आप रात को उठ कर जाने लगे, तो
वह भी चुपके से आपके पीछे हो लिया। जब आप अपने नियत स्थान पर पहुँचे तो
उसने देखा कि एक आधारी (लकड़ी की बनी हुई बैरागन) आपके आसन पर सीधी खड़ी
है। आप वहां जाकर अपने आसन पर विराजमान हो गये और नयन मूँद कर अपने आनन्द
में लीन हो गये। वह भक्त भी थोड़ी दूरी पर दुबक कर बैठ गया और श्री छवि को
निहारता रहा। जब आप वापिस लौटे तो उसने आधारी को वैसा का वैसा खड़े हुए
पाया। उसके दिल में इस आधारी (वैरागन) के समीप जाकर उसके परीक्षण का विचार
उठा। वह छुप कर एक ओर हो गया। जब आप उसे बिना देके लौट आए तो वह वहां गया,
जहाँ आपका आसन बना हुआ था। आसन कुशों का था, ऊपर सफेद चादर बिछी हुई थी।
उसके ऊपर आधारी बिल्कुल सीधी खड़ी हुई थी। उसने उसे हिलाया, परन्तु
आश्चर्य! वह आधारी तो सुमेरु पर्वत की तरह अडिग तथा अचल थी। उसने नीचे ऊपर
सब ओर देखा कि कहीं कोई कील तो नहीं लगाई गई, परन्तु कहीं भी कुछ दिखाई न
दिया। उसने उसे खूब ज़ोर से हिलाया, लेकिन हिलाने में असफलता प्राप्त हुई,
यहां तक कि कुशा के आसन को भी धरती से एक इंच ऊपर न उठा सका। उसने आसन के
आगे वन्दना की और लौट आया। मार्ग में बार-बार पीछे की ओर देखता कि कहीं अभी
वह आधारी गिरी तो नहीं। वह तो अपने प्रभु की आज्ञानुसार साधना में लीन थी
कि कब रात्रि हो और उसके मालिक उसे कृतार्थ करें। वह भक्त पुनः लौट गया और
श्रद्धा तथा प्रेम से उस आसन के सामने बार-बार वन्दना कर आधारी की स्तुति
अपने उद् गारों में इसप्रकार की-
शेष प्रसंग कल आयेगा।
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