Thursday, June 23, 2016

22.06.2016

आपकी श्रद्धा व भावना श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के प्रति उच्च स्तर की थी। एक बार आप स्थान गरेला ज़िला लाड़काना (सिन्ध) में विराजमान थे। गरेला में आपके कई धनाड्य भक्त भी श्रद्धालु थे। उनमें से भक्त जमीयतराय ने अपने भ्रमण के लिए एक कार खरीदी थी। सांय समय जब वह सैर के लिए जाता तो आपको भी सैर के लिए कार पर ले जाता। आप तीन-चार बार तो उसके साथ कार पर जाते रहे, पुनः कुछ सोचकर कार पर जाना छोड़ दिया। भक्त जमीयतराय ने जो आपका अनन्य श्रद्धालु था, आपसे कार पर न जाने का कारण पूछा। पहले तो आपने कोई कारण न बताया, परन्तु उसके अगाध प्रेम को देखकर आपने बताया कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री दूसरी पादशाही जी) तो सैर व यात्रा पैदल चलकर या घोड़े पर चढ़कर करते हैं और हम यहां कार में बैठकर सैर करें, यह बात हमें शोभा नहीं देती। आपकी श्रद्धा व सच्चाई का प्रभाव उस पर ऐसा पड़ा कि उसने विनय की- ''यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपनी यह कार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री दूसरी पादशाही जी) के श्री चरणों में समर्पित कर दूँ, क्योंकि इस कार को खरीद किये हुए अभी थोड़ा-सा समय ही हुआ है। यदि आपकी मौज हो तो नई कार भी ली जा सकती है।"
      आप (श्री तीसरी पादशाही जी) ने फ़रमाया कि भेंट करनी है तो नई वस्तु भेंट की जाए जो एक बार भी अपने प्रयोग में न लाई गई हो। नई वस्तु श्री चरणों में भेंट करना अधिक अच्छा होता है। इसप्रकार आप भक्त जी को उचित सलाह देकर उसको साथ लेकर लाड़काना (सिन्ध) से लाहौर (पंजाब) गए, वहां से डाज (Dodge) कम्पनी की नई कार खरीदी और उसे वहां से आश्रम पगाला ज़िला गुजरांवाला में ले गए।
      यह प्रसंग मार्च 1933 का है। उस समय श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी सन्त आश्रम पगाला ज़िला गुजरांवाला में संगतों को श्री दर्शन व अमृत वचनों से निहाल कर रहे थे। जब आप व भगत जी कार लेकर पहुँचे तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया हमें कार की ज़रूरत नहीं है। हमें तो पैदल यात्रा करने में बड़ा आनन्द आता है, लेकि आपकी व भगत जी की अत्यधिक श्रद्धा व प्रेम को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को कार स्वीकार करनी पड़ी। भक्त हरनाम सिंह जी (महात्मा पूर्ण श्रद्धानंद जी) कार चलाना जानते थे। अतः वे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को सैर पर ले जाते रहे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को कार पर विराजमान हुए देख सारी संगत तथा आप (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) अत्यन्त हर्षित हुए।

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