इसके बाद
आपने परमार्थ के लिए श्री आज्ञानुसार सिन्ध जाना था। आप लौटने को तैयार
हुए। भगत जी भी आपके साथ पुनः स्थान गरेला (सिन्ध) आ गये। आप अपने परमार्थ
पथ पर चलते हुए दिन-रात सत्संग की धारा प्रवाहित करने लगे। सन्त रज्जबदास
जी का कथन है-
।। दोहा ।।
सन्त नदी जल मेघला, चलैं विहंगम चाल ।
रज्जब जहँ जहँ पग धरें, तहँ तहँ करैं निहाल ।।
सन्त
महापुरुष- नदी व बादल- पक्षी की चाल चला करते हैं। यह तीनों जहाँ जहाँ पर
कदम रखते हैं, सबको शीतल बना देते हैं। आपके प्रेमी आप में अनन्य अनुराग और
अचल निष्ठा रखते थे। अब आप अपनी उच्च संस्कारी आत्माओं को जो सांसारिक
व्यवहार में ग्रस्त थीं, परंतु परमार्थ पथ के लिए भी जिज्ञासु थीं, उन्हें
इस पथ पर लाने के लिए स्वयं उनके पास गए। उनमें से एक भक्त हज़ारीमल जी
(महात्मा परम विवेकानन्द जी) भी थे।
आप
सिन्ध में बीचांजी स्थान में सत्संग की अमृत धारा प्रवाहित कर रहे थे।
आपके निवास स्थान से लगभग पाँच छः मील की दूरी पर एक गाँव भिरकण था, जहाँ
लोग पैदल आया-जाया करते थे। उन दिनों यातायात के साधन सुगम न थे। सवारी
इत्यादि का कोई प्रबन्ध न था। वहाँ एक भक्त किसी कार्य के लिए नित्यप्रति
पैदल जाया करता था। एक दिन आपकी मौज उठी कि हम भी उस गाँव में जाएँ। आपने
उस भक्त को कहा कि हमने भी उस गाँव में जाना है। उसने विनय की- प्रभो!
गर्मियों का मौसम है, पृथ्वी बहुत तपती है जिस पर पैदल चलने से आपको बहुत
कष्ट होगा। यही अच्छा होगा यदि आप अब न जाकर फिर कभी जायें। आपने फ़रमाया
कि हमारी आज ही वहाँ जाने की मौज उठी है, क्योंकि वहाँ बहुत ज़रूरी काम है।
इसलिए हमें वहाँ अवश्य ही पहुँचना है। वह भक्त महापुरुषों के गुप्त
रहस्यों को न समझता हुआ चुप हो गया। और आप भी उसके साथ गांव भिरकण जा
पहुँचे।
भिरकण पहुँच कर आप सीधे एक स्कूल में गए जहाँ लड़के पड़ते थे। स्कूल के सब
लड़कों को निहारते हुए आपकी दृष्टि भक्त हज़ारीमल पर पड़ी जो सातवीं कक्षा
में पड़ते थे। इन्हें देखकर आप दिल में विचार करने लगे यही लड़का उत्तम
संस्कारी मालूम होता है। यही हमारे काम का है। भक्त हज़ारीमल को समीप
बुलाया। उससे कुछ वार्तालाप किया। पाठशाला के सभी लड़के देखकर दंग रह गये
कि हज़ारीमल को क्या हो गया है। उसकी आँखों में आपके मिलने से एक अनूठी
मस्ती छा गई। वह उसी समय ही पद-पंकज का भँवरा बन गया। आपने उसे नाम उपदेश
दिया और आश्रम का पता बता कर लौट आए। वहां से लौट कर उस सेवक ने ( जो साथ
गया था ) आपके श्री चरणों में प्रार्थना की कि महाराज! यदि आप यहां होते तो
आपके सत्संग में हज़ारों लोग आते और उनका कल्याण होता और आपका दिन सफल हो
जाता। आपने फ़रमाया- "भक्त जी! आप तो एक दिन की बात कर रहे हो, परन्तु
हमारा तो सिन्ध में आना ही आज सफल हो गया है। आगे चलकर जब वह लड़का परमार्थ
के काम पर लगेगा। तो कितने ही जीवों का भला करेगा।" वह भक्त यह उत्तर
सुनकर श्री चरणों में गिर पड़ा और कहने लगा- आप त्रिकालदर्शी हो। आने वाले
समय में क्या होना है, यह आप ही जानते हो। हमारी भूल क्षमा करें।
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