Tuesday, June 14, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज....

कुछ समय तक आप श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के साथ रहे। जहां भी वे जाते, आपको निजी श्री सेवा का सुअवसर प्रदान करते। आप भी उनके श्री दर्शन करते हुए श्री आज्ञा में सदा तत्पर रहते। आपने सेवा का वह अद्भुत चमत्कार दिखाया कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की प्रसन्नता एवं कृपा के पात्र बन गये। वे मन ही मन आपके त्याग और प्रेम को देखकर अत्यन्त पुलकित हो उठते थे। आपको उस समय न दिन में विश्रमा की चिन्ता रही न रात्रि को नींद के लिए ही विचार उत्पन्न हुआ।
      सद्गुरु की कृपा का पात्र बनने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि जीव सद्गुरु की आज्ञा व मौज पर चलने एवं भक्ति के प्रत्येक नियम पर आचरण करने के लिए तत्पर रहे। उपनिषद्कार का कथन है कि परमात्म-तत्त्व को वही जानने वाला है अर्थात आत्म साक्षात्कार वही कर सकता है जिसके अन्दर प्रभु मिलन की तड़प है, जो प्रभु के अतिरिक्त किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता। अपने विचरों को अथवा अपने मस्तिष्क को अन्य झंझटों में नहीं डालता अर्थात श्री गुरुदेव की मौज में राज़ी रहता है। उनकी आज्ञानुसार सेवा में निरत रहकर श्री प्रसन्नता को प्राप्त करता है। गुरु-आज्ञा मानना ही गुरु-भक्ति का मुख्य नियम है। ऐसा ही आपने किया तथा इस सिद्धान्त पर चलकर गुरु-भक्ति के लिए यह सिद्धान्त आवश्यक बताया कि 'मनमति का त्याग कर गुरुमति को ग्रहण करना।' यही नियम ही गुरु-भक्ति की मंज़िल को प्राप्त करने का एकमात्र सरल तथा अत्युत्तम साधन है।

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