दूसरे दिन प्रातःहोते ही पंडित जी का
हृदय प्रेम में झूमने लगा। उसने अनुभव किया कि उसने जैसे किसी खोई हुई
वस्तु को प्राप्त किया हो। उसने विनय की- ''प्रभु! आपका यह अपना स्थान है,
यहीं पर ही कृपा फरमाइये।" उसकी विनय तथा प्रेमी संस्कारी आत्माओं की प्साय
बुझाने के लिए दिन-रात वहीं सत्संग प्रवाह चलने लगा। प्रेमीजन विभिन्न
प्रकार की भोजन सामग्री तथा श्रद्धायुक्त भेंट श्री चरणों में लाने लगे। यह
देख कर पंडित जी बहुत हैरान थे कि ऐसा दिव्य स्वरूप, मनोहारी
'साधु-महात्मा' आज तक तो देखने में नहीं आया जो इतनी जल्दी प्रभाव डाल सके।
कोई भी प्रेमी जैसी भी भेंट लाता अर्थात यदि कोई मक्की या जौ की रोटी अथवा
कोई अन्य पकवान आदि लाता तो आप सब कुछ सहर्ष स्वीकार करते। बड़े प्रेम से
सबमें बांटते और प्रसन्न होते। इससे उन प्रेमियों की श्रद्धा, प्रेम और
विश्वास अधिक बढ़ जाता। आप एक ही नज़र से प्रेमियों के हृदय पटल पर अधिकार
कर लेते। जो भी जिज्ञासू शरण में आया अथवा आपकी पावन संगति जिसे भी मिली,
वह सारी सुधि भूल जाता। पण्डित जी का अपना दिल भी अब आनन्द की लहरों में
झूम रहा था, वे दूसरों के विषय में क्या सोचते? आठ दिन पश्चात जब आप वहां
से किसी अन्य स्थान की ओर जाने लगे तो पण्डित जी ने आग्रह पूर्वक कहा कि
दीन दयाल जी! इस स्थान को अपना समझ कर कृतार्थ करते रहें। कितना प्रताप था
श्री दर्शन का? कहाँ तो रात्रि भर स्थान देने को तैयार नहीं था और अब वह
विलग होना नहीं चाहता था।
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