इस
प्रकार की शुभ प्रेरणा आप बार-बार पिताजी को दिया करते। इससे सिद्ध होता है
कि स्वभावतः संसारी बन्धनों से मुक्त रहना चाहते थे। आपकी शुभ प्रेरणा का
प्रभाव आपके पूज्य पिताजी के मन पर पूर्ण रूप से पड़ा। उन्होंने श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के रूहानी जानशीन होने के
चार-पांच मास पश्चात ही श्री चरणों में शरणागति प्राप्त कर ली। इसके पश्चात
शीघ्र ही विनय कर साधु-वेष भी ग्रहण कर लिया। साधु वेष में महात्मा
पुरुषोत्तमानन्द जी के रूप में उन्होंने दरबार की हित-चित्त से सेवा की।
आपके मन की साध पूरी हुई। पिताजी के शरणागत होने पर मार्ग की बाधाओं से
स्वतन्त्रता प्राप्त हो गई। यदि विघ्न बाधाऐं आतीं भी तो आप उनसे कहां डरने
वाले थे। आप नाम रूपी अमृत के आनन्द में हमेशा लीन रहते। श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी के श्री चरणों में आपका प्रेम दिन प्रतिदिन अधिकाधिक बढ़ता गया।
एक
बार उन्हीं दिनों में जब आप निकटवर्ती स्थान पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
के श्री दर्शन के लिए गये, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने स्वाभाविक ही
सत्संग में यह प्रवचन किये-
।। दोहा ।।
भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोई ले जाय ।
कह कबीर कछु भेद नहीं, कहा रंक कहा राय ।।
अर्थात संसार के मैदान में ईश्वर ने भक्ति की गेंद उछाल दी है। जैसे
खिलाड़ी गेंद के साथ खेलते हैं, उनमें निपुण खिलाड़ी ही चौगान की गेंद को
पकड़ सकता है, साधारण नहीं, ऐसे ही भक्ति की गेंद भी चतुर गुरुमुख ही ले
सकता है। इसके लिए ग़रीब-अमीर का कोई प्रश्न नहीं। जो भी चाहे इसे प्राप्त
कर सकता है। इस भक्ति रूपी गेंद से खेलने के लिए सिर-धड़ की बाज़ी लगानी
पड़ती है। अपनी मनमति का त्याग कर गुरु के बताए हुए उपदेशों पर चलना ज़रूरी
हो जाता है। इस भक्ति को पाने के लिए त्याग, सेवा एवं अनन्य प्रेम की
ज़रूरत है।
आपके
हृदय में इन प्रवचनों को सुनकर एक त़ूफान उमड़ा कि अब तो जिस तरह से हो
सके इस भक्ति रूपी गेंद को प्राप्त करना ही है। आपने शीघ्र ही स्वयं भी
शरणागत होने के लिए विनय की। पिताजी को पहले ही आपने शुभ प्रेरणा देकर साधु
बनवा दिया था। घर की सम्पत्ति-जायदाद-सुखैश्वर्य के सबी सामान आपके पिताजी
आपको सौंपकर निश्चिन्त होकर भक्ति के मधुर अमृत का पान करने लगे। आपके
हृदय में भी इस सारी सम्पत्ति को श्री दरबार की सेवा में लगाने की भारी
उमंग थी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी निजमुख से कईं
बार यह वचन फरमाते थे कि आपने अपने पिताजी को साधु बनने के लिए इसी कारण ही
ज़ोर दिया कि घर की सारी सम्पत्ति श्री गुरु-सेवा में सफल हो। आपने अपने
दिल की भावना को पूरा किया तथा सम्पत्ति, धन धान्य सहित स्वयं को श्री
चरणों में भेंट कर शरणागति के पथ को दृढ़ किया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
ने भी अनन्य शिष्य की प्राप्ति पर दिल में प्रसन्नता अनुभव की।
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