इस
प्रकार आप सत्संग-उपदेश की पावन गंगा निरन्तर बहा रहे थे और प्रेमीजन
संस्कारी आत्माएं उसमें मज्जन कर कृतार्थ हो रही थीं। आप सिन्ध प्रान्त के
प्रत्येक गांव में तथा उस पूर्ण क्षेत्र में नाम की ज्योति का प्रकाश
फैलाने में संलग्न थे।
आप लक्खी से एक बार भैन गांव में गए वहां पर भक्त ककूमल जी तथा भक्त
फिरन्दमल जी के घर ठहरे। कुछ समय पश्चात वहां आश्रम भी बनवाया। वहां पर आप
नित्यप्रति नदी के किनारे सुहावने वातावरण में एकान्त शान्त स्थान पर
रात्रि समय भजनाभ्यास के लिए जाते तथा दिन के समय सत्संग कार्य करते। आप
परब्रह्म होते हुए भी नर-लीला के रूप में सर्व कार्य जन कल्याण के लिए करते
जिसे जीव की बुद्धि समझ ही नहीं सकती। किसी भक्त के मन में यह ख़्याल आया (
जो श्री चरणों की सेवा में रहता था) कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भी
हमारी ही तरह रात्रि को विश्राम करते हैं। प्रातः उठते हैं और दिन के समय
सत्संग कार्य करते हैं। हमें तो हर समय भजनाभ्यास नियमपर्वक करने के लिए
उपदेश करते हैं, न जाने स्वयं कब भजनाभ्यास करते हैं? प्रभाव भी इनका इतना
है कि हृदय में किसी और के लिए स्थान ही नहीं रहा। ऐसा तेजोमय सुन्दर
स्वरूप है जिससे आप से आप लोग इधर खिंचे चले आते हैं। मैं स्वयं भी तो
दीवाना बना रहता हूँ। समझ में कुछ नहीं आता कि यह कैसी लीला है। कई बार
श्री चरणों में कुछ पूछने के लिए जाता हूँ, परन्तु सम्मुख जाते ही सब कुछ
भूल जाता हूँ।
इधर
आप दिन के समय सत्संग का कार्य करते और रात्रि समय जब समस्त संसार निद्रा
में सोया हुआ होता तथा आपके सेवक भी गहरी निद्रा में सो जाते तो आप उठकर
योगाभ्यास के लिए दूर चले जाया करते थे। आश्रम से दूर बाँध के समीप आपने एक
आसन बनाया था, वहां पर जाकर विराजमान हो जाते। प्रातः लोगों के उठने से
पहले ही लौट आते ताकि किसी को भी पता न चले। सन्त-महापुरुषों का यह आदिकाल
का नियम है कि -
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागृति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ।
श्री मद्भगवद् गीता 2/69
सम्पूर्ण
भूत प्राणियों के लिए जो रात्रि है, उस नित्य शुद्ध बोधस्वरूप परम आनन्द
में ब्रह्मनिष्ठ योगी पुरुष जागता है और जिस नाशवान क्षणभंगुर सांसारिक
सुखों की आशाओं में सब भूत प्राणी जागते हैं, तत्त्व को जानने वाले
मनीषियों के लिए वह रात्रि होती है अर्थात जब संसार के लिए रात्रि होती है
योगी व परमात्मा से मिलने वाले अभिलाषियों का वही दिन होता है। वे इस
शान्त-एकान्त वातावरण में भजनाभ्यास में लीन हो जाते हैं। जब संसारी लोगों
का दिन होता है तो सन्त महापुरुषों की रात्रि होती है, क्योंकि दिन के समय
सन्त महापुरुष परमार्थ का कार्य करते हुए थोड़ा-सा विश्राम कर लेते हैं।
श्रीरामचरितमानस में अयोध्याकाण्ड में लक्ष्मण जी गुह को उपदेश करते हुए
फ़रमाते हैं-
।। चौपाई ।।
एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच बियोगी ।।
कि
इस संसार रूपी रात्रि में वे योगीजन जागते हैं, जो माया से विरक्त तथा
परमार्थी होते हैं और वे ही रात्रि के समय योगाभ्यास किया करते हैं।
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