Monday, June 20, 2016

20.06.2016


         ऐ आधारी! योगिन बन, तू प्रभु के ध्यान में लीन रहे।
अडिग हिमालय की भाँति, तू एक जगह आसीन रहे ।।
जड़ होकर भी प्रेम का अद्भुत, सब को पाठ पढ़ाती है।
प्रीति निभाने की रीति का, ढंग विचित्र बताती है।।
अब वह मन ही मन लजाता हुआ आश्रम में आ गया। आते ही आपजी के श्री चरणों में दण्डवत की। आपने मुसकुराते हुए पूछा-प्रेमी कहाँ गया था? उसने पुनः पुनः वन्दना कर क्षमा मांगी और विनय की कि प्रभु! मेरे मन ने मुझे धोखा दिया था, आपने कृपा की है, इसीलिए क्षमा मांगता हूँ। आपने वचन फ़रमाये- ''सन्त महापुरुषों की परीक्षा लेना उचित नहीं। यह मन तो जन्म जन्मों से जीव का शत्रु है। पग-पग पर जीव को धोखे में डालकर इसे गिरावट की ओर ले जाता है। मन ही तो जीव को भक्ति-मार्ग पर चलने नहीं देता। गुरुमुख को इसके धोखे में नहीं आना चाहिए। सन्त महापुरुषों की परीक्षा लेना स्वयं को धोखे में डालना है।"  उस प्रेमी ने पुनः क्षमा मांगी।
आपने परमार्थ पथ पर आरूढ़ होकर साधु-वेष में पूरे सिन्ध प्रान्त तथा बिलोचिस्तान को अपने अमृत प्रवचनों से अनगृहित किया। इसके अतिरिक्त ज़िला डेरागाज़ीखां में हज़ारों जीवों को भक्ति पथ पर लगाया। हज़ारों प्रेमी जिज्ञासु आपके शिष्य बने। आपने सिन्ध प्रदेश में सत्संग के लिए निम्नलिखित आश्रम बनवाये-
1. लक्खी ज़िला सक्खर 2. भैन गांव ज़िला सक्खर 3. सक्खर शहर 4. गरेला ज़िला लाड़काना 5. गोघाना ज़िला लाड़काना 6. नसीराबाद ज़िला लाड़काना 7. वहोआ ज़िला डेरागांज़िखां 8. मांडी ज़िला सक्खर।
इन स्थानों पर प्रतिदिन प्रातः सांय भक्त लोग सत्संग के लिए आते और दोनों समय भजन अभ्यास भी होता । कुछ नियत किए हुए प्रेमी-गुरुमुख इन आश्रमों का प्रबन्ध तथा सेवा जी-जान से करते। समय समय पर संगतें आपके श्री चरणों में दर्शन देने के लिए विनय करतीं। आप उस विनय को स्वीकार कर कई कई दिन तक एक स्थान पर ठहरते और सत्संग प्रवाह चलता रहता। आप जिस जिस स्थान पर जाते, प्रेमियों की संख्या अधिक से अधिक हो जाती थी। आप सत्संग का ऐसा अमृतमय प्रवाह बहाते कि जिज्ञासुओं को खाना-पीना भी भूल जाता था। दूर-दूर से आये हुए प्रेमी कई-कई दिन उन स्थानों पर ठहरे रहते। इन स्थानों पर लंगर व ठहरने का प्रबंध मुख्य-मुख्य भक्तों की ओर से होता था। जिज्ञासु, श्रधालू व प्रेमीजन जो सेवा, सामान एवं धन राशि भेंट करते, आप सब सेवा चकौड़ी सन्त आश्रम में श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की आज्ञानुसार लंगर में लगा देते। आपने गुरु-भक्ति पथ को दृढ़ करने के लिए इस प्रकार का आदर्श स्थापित किया, जैसे भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी महाराज ने अर्जुन को उपदेश दिया है कि-

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