Monday, June 27, 2016

27.06.2016

बाद में जब भक्त हज़ारीमल जी की लगन व रुचि अधिक बढ़ती गई तो वहां पर एक बाबा जी रहते थे, जो उस गाँव में पूजनीय थे। भक्त हज़ारीमल जी ने इस सच्चे उपदेश की चर्चा उन से भी की। बाबा जी ने पूछा- "क्या तुमने उन्हीं से गुरु-दीक्षा ली है जो घोड़े पर चढ़ने की देरी में ही ज्ञान देते हैं।" उसने तो कटाक्ष किया, किन्तु कैसी विचित्र बात है कि आप इतनी शीघ्रता से माया के बन्धन से मुक्त कराकर ज्ञान का प्रकाश देते थे कि ऐसा अन्यन्त्र उदाहरण मिल सकना बड़ा कठिन है।
भक्त हज़ारीमल जी एक बार श्री दर्शन के लिए लक्खी गये और बाबा वाली बात श्री चरणों में निवेदित की। आपने मुस्कुराते हुए फ़रमाया - "हमने धुर दरगाही हुक्म को देखना है न कि बाबाजी को। उन्होंने अपना काम करना है, हमने अपना काम करना है।" महापुरुष तो त्रिकालदर्शी होते हैं। जो उनकी अपनी रूहें अर्थात परमार्थ तथा गुरु-भक्ति पर चलने वाली रूहें होती हैं, वे उनको स्वंय ढूँढ कर उसे परमार्थ का कार्य करवाते हैं।
      कितनी अपरम्पार लीला है। जिस मालिक को मिलने के लिए योगी, ऋषि, मुनि तपस्या करते हैं, हज़ारों वर्षों की तपस्या करने पर भी उन्हें मालिक की प्राप्ति सुलभ नहीं होती, वही इष्टदेव मालिक सन्त-महापुरुषों के रूप में शिष्यों की खोज करते हैं।
भक्त हज़ारीमल जी का कहना है कि जनवरी सन् 1936 में मुझे टी.बी. की बीमारी हो गई थी। मैं टी.बी. के अस्पताल में दाखिल हुआ। सात मास वहां रहा, परन्तु चिकित्सा करने पर भी ठीक न हुआ।
      डाक्टरों ने मुझे कहा कि तुम्हारा रोग तीसरे दर्जे पर पहुँच चुका है। यह झय रोग (टी.बी.) किसी दशा में भी ठीक नहीं हो सकता। भक्त हज़ारीमल जी ने मन में सोच कि अब बचने की कोई आशा नहीं है, इसीलिए क्यों न मैं अपने जीवन के कुछ दिन श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की सेवा में ही व्यतीत कर लूँ। वे सक्खर शहर के सैनिटोरियम अस्पताल से सीधे लक्खी लक्खी के आश्रम में पहुँच कर सेवा करने लगे। एक दिन उन्होंने अपने मन में सोचा कि मरने से पहले एक बार मुझे श्री सद्गुरु देव महाराज जी के श्री पवित्र दर्शन हो जाते तो अच्छा होता। उस समय श्री सद्गुरु देव महाराज श्री तीसरी पादशाही जी नसीराबाद में विराजमान थे और सत्संग का कार्य पहले अधिक बढ़ चुका था। परन्तु जिस समय उनका विनय-पत्र श्री चरणों में पहुँचा तो आपने महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी को लक्खी स्थान पर भेजा कि भक्त हज़ारीमल जी को अपने साथ नसीराबाद ले आओ।
जब महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी लक्खी पहुँचे तो क्या देखते हैं कि भगत जी को 103 (डिग्री) का बुखार है और स्टेशन पर पहुँचने के लिए कोई सवारी भी नहीं है। जब महात्मा जी ने भक्त जी को श्री दर्शनों के लिए चलने का सन्देश दिया तो उनकी खुशी की सीमा न रही। उन्हें बुखार भूल गया और वे साथ चलने को तैयार हो गए। रेलवे स्टेशन रुक (Ruk) वहाँ से पांच मील की दूरी पर था। गाड़ी का समय भी हो चुका था। उन्होंने पांच मील का रास्ता भागते भागते तय कर स्टेशन पर गाड़ी को पकड़ा। लक्खी स्थान के लोगों ने भक्त जी को इस हालत में जाने से मना किया था कि ऐसा न हो कि रास्ते में तुम्हारी हालत अधिक बिगड़ जाए, परन्तु भगत जी ने किसी की एक न मानी। जब वे स्टेशन पर पहुँचे तो बुखार स्वयं उतर गया और सब लोग हैरान हो गए। जो बुखार डाक्टरों के इतना इलाज करने पर भी न उतरा, वह उस दिन बिल्कुल ही उतर गया और भक्त जी निरोग हो गए। डॉक्टर बोधराज जी ने इनका इलाज किया था। वे जब कभी इनसे मिलते तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की महिमा करते हुए कहते जहां डाक्टरों के दिमाग़ ने काम नहीं किया, वहां श्री सद्गुरुदेव जी की कृपा काम कर गई। निस्सन्देह धन्य हैं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी।
      अब भक्त हज़ारीमल जी श्री दरबार में शरणागत होकर हित-चित से सेवा करने लगे तथा कुछ समय पश्चात श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने इन्हें साधु वेष देकर इनका नाम महात्मा परम विवेकानन्द जी रखा। इन्होंने अन्तिम स्वांस तक बड़े उत्साह, श्रद्धा, प्रेम और सच्ची लगन से श्री दरबार की सेवा की।

No comments:

Post a Comment