बढ़ गये गुरु भक्ति पथ पे, परमार्थ पथ के राही ।
श्री आज्ञा व श्री सेवा में, गुरु की प्रसन्नता पाई ।।
सब जंजाल झटक कर अपना, औरों को दीन्ही रिहाई ।
एक नई दुनिया को बसाने, प्रगटी जोत इलाही ।।
विलक्षणता
आपका प्रथम गुण था। बाल्यकाल से आकर्षण शक्ति का भी गुण विद्यमान था। इसके
साथ-साथ सुन्दर स्वरूप, सुडौल शरीर, चेहरे पर एक अनोखे ढंग की दीप्ति,
ओठों पे मधुर मुसकान, बांकी चितवन और मधुर वाणी- भला ऐसा कौन होगा जो इस
दिव्य स्वरूप और तेजोमय मूर्ति को देखकर आकर्षित न होगा। श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी ने जैसे स्वयं ही अपने स्वरूप जैसा इस दिव्य रूप को बनाया हो।
विधाता तो इस दिव्य स्वरूप का दर्शन कर आश्चर्य में पड़ गया, साथ में साधु
वेष। इस वेष ने जैसे आपकी मनोहारी झांकी की शोभा को ओर भी निखार दिया। भगवे
वेष के साथ उसी रूप की आभा मुखमण्डल पर इठलाती थी। मस्तक पर एक नूरानी तेज
झलकता था। प्रकृति ने अजब रंग दिखाया है, उद्यान में अनेक रंगों के पुष्प
खिलाये, परन्तु पुष्पराज गुलाब तो अपनी दिव्य छटा से मन मुग्ध करने के लिए
अनोखे ढंग से उद्यान में शासन करता है। ऐसे ही हृदय रूपी उद्यान पर आपने
अनोके ढंग से शासन किया।
आप श्री आज्ञानुसार फोर्टसन्डेमन तथा बिलोचिस्तान होते हुए रुक (Ruk)
स्टेशन पर पहुँचे। यहाँ आपको सेठ बन्नामल जी मिले। वे आपको अपने साथ लक्खी
ले गये। यहाँ पर आप भक्त जी के साथ एक धर्मशाला में ठहरे। जब धर्मशाला में
गये तो उसके निवासी पंड़ित जी ने स्थान देना अस्वीकार कर दिया। आपने भगत जी
को फ़रमाया कि उससे एक रात्रि यहां ठहरने के लिए स्थान मांगें। भक्त जी ने
श्री वचनानुसार समझा-बुझा कर एक रात्रि के लिए स्थान ले लिया। आपने
परमार्थ-कार्य आरम्भ किया। श्री पावन मृदल वचनों से सर्वप्रथम पंडित जी को
उपदेश दिया। रात्रि के होने तक ही संस्कारी उच्च आत्माएं बरबस आपकी ओर
खिंचती चली आईं। यह दिव्य गुणसम्पन्न विभूति जब जिस ओर भी पग बढ़ाती,
मुस्काते वदन से चित्ताकर्षक किरण फूटती जो बरबस दिलों को खींचने लगती। बस
फिर क्या था? प्रेमीजन भ्रमरों की न्याईं उस सरस ज्ञान-कमल पर लगे
मंडराने। आप भी श्री वचनों से सबको कृतार्थ करने लगे।
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