Tuesday, June 28, 2016

27.06.2016

इस प्रकार सम्पूर्ण सिन्ध में आप (श्री तीसरी पादशाही जी) ने नाम की अमर ज्योति का प्रकाश कोने-कोने में भर दिया। पहले से ही आप श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी की श्री आज्ञानुसार अपने ही नाम पर नाम की दीक्षा दे रहे थे तथा सम्पूर्ण सिंध के भक्तों के घर में आप ही की श्री मूर्ति विराजमान थी। अन्य प्रचारक महात्मा जन जिनको श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी ने अन्य स्थानों पर सत्संग उपदेश के लिए भेजा था, वे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के नाम पर सत्संग कर रहे थे। उनमें से कुछ महात्माजनों ने आते-जाते हुए सिन्ध में एक अनोखी रचना देखी कि आप ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) अपने नाम पर नाम-उपदेश व गुरु-दीक्षा देते हैं तथा अपनी ही पूजा करवाते हैं। उनके दिल में कुछ शंका उत्पन्न हो गई।
      एक बार महात्मा धर्मात्मानन्द जी से रहा न गया। उन्होंने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के चरणों में जाकर सिन्ध का सारा वृतान्त कह सुनाया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया- " वे हमारी जी आज्ञा से सब कुछ कर रहे हैं। इसमें किसी को संशय करने की आवश्यकता नहीं। बिना आज्ञा के ऐसा करने की किस में शक्ति है? उन महात्मा जी ने क्षमा मांगी। जब उन्होंने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही जी) के बढ़ते हुए तेज को देखा तो श्रद्धा व प्रेम से आपकी सेवा करने लगे और अन्तिम श्वास तक श्री दरबार की सेवा करते रहे।
      अब ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) की विनय करने पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी सिन्ध में पधारे। उस समय सिन्ध के भक्तों ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के चरणों में विनय की कि अपनी ही श्री मूर्ति पूजा के लिए देवें। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पदाशाही जी) उस समय साधु वेष में थे तथा महात्मा रोशनानन्द जी उनकी सेवा में हुआ करते थे। भक्तों के विनय करने पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने आप ( श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) की ओर संकेत करते हुए फ़रमाया- " आप लोगों के पास जो पहले श्री मूर्ति है वही ठीक है।" अर्थात आपने पहले ही दर्शा दिया कि ये (श्री तीसरी पादशाही जी महाराज) परिपूर्ण हैं। हम में और इनमें कोई भेद नहीं।

No comments:

Post a Comment