।। श्लोक ।।
यद्यदारचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।।
श्री मद्भगवद्गीता 3/21
हे
अर्जुन! श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करते हैं, अन्य पुरुष भी उसके अनुसार ही
चलते हैं। वे श्रेष्ठ पुरुष जो कुछ प्रमाणित कर देते हैं, लोग भी उसके
अनुसार ही बर्तते हैं। अर्थात आपने वही नियम अपनाये जो गुरु-भक्ति मार्ग
में अनिवार्य हों। जब गुरु-दीक्षा लेकर आपने तन-मन-धन एवं सर्वस्व समर्पित
कर दिया तो सब कुछ सद्गुरु का बन गया। उनकी श्री आज्ञा तथा श्री प्रसन्नता
ही शिष्य का धर्म बन गया। आप भक्तों, जिज्ञासुओं एवं प्रेमियों द्वारा लाई
हुई वस्तुओं तथा श्रद्धायुक्त भेंट को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री
दूसरी पादशाही जी) के श्री चरणों में भेंट कर देते। आप फ़रमाते थे कि संसार
की प्रत्येक वस्तु अपने इष्टदेव जी के चरणों में समर्पित करके भक्ति में
दिल लगाना चाहिए। धनी धर्मदास जी ने भी ' श्री गुरु महिमा' में कहा है कि -
असन वसन वाहन अरु भूषण ।
सुत दारा निज परिचारक गण ।।
कर सब भेंट गुरु के आगे ।
भक्ति भाव उर में अनुरागे ।।
अर्थात
श्री सद्गुरुदेव जी के चरणों में श्रद्धा-प्रेम से परिपूर्ण होकर जाना
चाहिए। जो कुछ वे दें, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए। कई बार भक्त लोग अच्छे
वस्त्र व कईं प्रकार की वस्तुएँ आपको भेंट कर सेवन के लिए विवश करते, लेकिन
आप फ़रमाते- जो कोई श्रेष्ठ पदार्थ पाऊं, सो गुरु चरणन आन चढाऊँ। " आप
हमें भेंट करते हो तो हम अपने इष्टदेव श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के चरणों
में भेंट करेंगे।
आपकी सेवा, भावना और श्रद्धा को देख कर सत्संगी लोग अधिक प्रभावित होते
थे। जब आप सिन्ध से श्री दर्शन के लिए जाते तो बहुत सी संगत आपके साथ जाती
थी। उन लोगों की श्रद्धा एवं प्रेम को देखकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी(
श्री दूसरी पादशाही जी) बहुत प्रसन्न होते। आपने अपने प्रेमियों को भी
त्याग का मार्ग दिखाया और सबमें त्याग एवं वैराग्य की भावना कूट-कूट कर भर
दी।
आप
समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री
दर्शन के लिए जाते। एक बार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही
जी चकबंदी व भखड़ेवाली में विराजमान थे। आप श्री दर्शन के लिए श्री चरणों
में पहुँचे और सिन्ध में कृपा करने के लिए श्री चरणों में विनय की। आपकी
विनय स्वीकार कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सिन्ध को कृतार्थ किया। आपने
सिन्ध प्रदेश व वहोआ के कुछ एक श्रद्धालुओं को सन्यास भेष भी दिलवाया।
आपके श्रद्धालु व प्रेमी एक से एक बढ़कर धनी थे फिर भी आप उन्हें सादगी तथा
फ़कीरी का पथ दिखलाते थे। प्रेमी बढ़िया से बढ़िया भोग प्रसाद भेंट करते,
परन्तु आप मक्की का फुलका तथा साग ही पसन्द करते और उसी का ही श्री भोग
लगाते। उस समय जिन प्रेमियों ने आपकी पावन लीला को निहारा, वे आज भी अपने
मुँह से यही कहते हैं कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तीसरी पादशाही
जी) मक्की का फुलका और साग का भोग लगाते तथा साथ ही फ़रमाते थे- "खा के
देखो, कितना स्वाद है इसमें। ऐसा स्वाद तो पकवान्न और अन्य पदार्थों में भी
नहीं मिलता। साधारण भोजन से मन भी शुद्ध होता है।" इसीलिए प्रेमीजन
सात्त्विक भोजन ही श्री भोग के लिए लाया करते थे।
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