Wednesday, June 29, 2016

28.06.2016

आपने साधू वेष में ही अपनी विलक्षणता प्रकट की। जो लोग भी आपकी पावन संगति को प्राप्त करते, वे सुध-बुध भूल जाते। उस समय कोई यह न समझ सकता था कि आप अभी विधि के अनुसार रूहानी जानशीन हुए हैं या नहीं। आप जन्म से ही परमहंस के रूप को लेकर प्रकट हुए थे। कितनी विचित्र लीला है कि आप तो अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन के लिए लालायित रहते और सिन्ध में प्रेमीजन तथा जिज्ञासु आपके श्री दर्शनों की चाह में तड़पते। आपने प्रेम-भक्ति का ऐसा नशा पिलाया, जिसको पीकर सभी प्रेमी आन्तरिक आनन्द में झूमने लगे। कई बार तो बड़े-बड़े लोगों को आपके पीछे फिरते हुए देखा गया। आपके श्री दर्शन की लालसा के लिए दिवाने बने हुए उन्हें देखकर  अन्य लोग (जो इस पथ पर न आये थे) हैरान हो जाते कि इन सत्पुरुषों में कौन सी ऐसी शक्ति है जिससे दिल स्वयं ही मतवाला हो जाता है। उस समय अपनी स्थिति का भी किसी को ख्याल न रहता। लोक मर्यादानुसार मान-अपमान की चिन्ता भी न रहती। लोग आपको प्रेमवश 'जादूगर' भी कहते। आप भी तो प्रेम-भक्ति का ऐसा जादू चलाते कि उस अनूठी अनुपम मस्ती में खोकर प्रेमी सदा के लिए उसमें खोये ही रहना चाहते। जिस दिव्य आनन्द की खोज साधक, सिद्ध, योगी, तपस्वी जीवनपर्यन्त कठिन तपस्या एवं साधना में खोजते हैं, परन्तु फिर भी उन्हें सुलभ नहीं होता, वह शाश्वत आनन्द आपके श्री दर्शन मात्र से ही प्रेमीजनों को प्राप्त हो जाता। जिसने एक बार आपकी श्री सुषमा को निहारा, जिसके साथ एक-दो वचन भी हुए, वह तो अपना अस्तित्व ही खो बैठा। वह प्रेम-भक्ति के रंग में रगा गया।
      आपकी कीर्ति सिन्ध के आसपास के क्षेत्रों में अधिक फैल चुकी थी, क्योंकि आपने सिन्ध के गांव-गांव व शहर-शहर में पहुँचकर भक्ति का सन्देश दिया। आपकी कीर्ति सुनकर शिकारपुर (सिन्धप्रान्त) निवासी सेठ ताराचन्द जी आपके दर्शन के लिए आए। यह आपके अति विश्वासी और श्रद्धालु भक्त बन गये। इनका व्यापार काफ़ी बढ़ा हुआ था। इनका व्यापार शिकारपुर के अतिरिक्त कोयटा (बिलोचिस्तान) में भी चलता था तथा वहां पर ठहरने के लिए कोठियां भी बनी हुईं थीं। सेठ ताराचन्द जी व्यापार के काम के लिए जब भी कोयटा जाते तो आपजी के श्री चरणों में प्रार्थना करते कि कोयटा चलकर अपने पावन सत्संग रूपी अमृत से जीवों की प्यास बुझायें। आप उनकी प्रार्थना स्वीकारकर कई बार कोयटा पधारे। यहां पर आपने अनेकों जीवों को सत्संग-उपदेश से परितृप्त किया। काफ़ी संख्या में  लोग आपके श्रद्धालु बन गए।

No comments:

Post a Comment