कुछ
समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी लक्की मरवत् में अपने पवित्र सत्संग
उपदेश-अमृत की धारा प्रवाहित करते रहे तथा इस समय में आप श्री चरणों में
बैठ कर कर्म, भक्ति और ज्ञान की त्रिवेणी में मज्जन कर आत्मिक आनन्द
प्राप्त करते रहे। इसके पश्चात जब श्री सद्गुरु देव महाराज जी श्री दूसरी
पादशाही जी टेरी लौटने लगे तो आप तथा महात्मा योगात्मानंद जी एवं भक्त
साहिबराम जी भी उनके साथ श्री परमहंस दयाल जी श्री पहली पादशाही जी के श्री
दर्शन के लिए मार्च सन् 1918 में टेरी गए। जब आपने श्री हुज़ूरी में
उपस्थित होकर श्री चरणों में मस्तक झुकाया तो उन्होंने अपनी तत्व दृष्टि से
आपकी उत्तम भक्ति को परखते हुए फ़रमाया- ''आप (श्री स्वामी जी श्री तीसरी
पादशाही जी) को परमार्थ का बहुत बड़ा कार्य करना है।'' साथ में यह भी
फ़रमाया कि जब परमार्थ की तरफ प्रवृत हुए हो तो संसार की ओर कतई ध्यान नहीं
देना। यह बात गांठ बांध लो। तत्पश्चात आपका हाथ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
(श्री दूसरी पादशाही जी) के हाथों में स्वयं करकमलों से देकर फ़रमाया-''
आपको परमार्थ-लाभ इनसे ही प्राप्त होगा।'' पुनः फरमाया यह शेअर पढ़ो कि-
।। शेअर।।
चूँकि करदी ज़ाते-मुर्शिद रा कबूल ।
हम ख़ुदा दर ज़ातश आमद हम रसूल ।।
अर्थात्
जब पूर्ण सन्त सद्गुरु की शरण विशुद्ध मन से ग्रहण कर ली तो सद्गुरु के
पावन स्वरूप में ही मानो परमात्मा की प्राप्ति हो गई। परमसन्त श्री कबीर
साहिब जी ने भी यही विचार अन्य रूप में प्रस्तुत किये हैं। -
दोहा एक नाम को जान करि, दूजा देइ बहाय ।
तीरथ ब्रत जप तप नहीं, सतगुरु चरन सहाय ।।
सब आये उस एक में, डार पात फल फूल ।
अब कहो पाछे क्या रहा, गहि पकड़ा जब मूल ।।
अर्थात सद्गुरु का नाम वृक्ष की जड़ की न्याईं है। जब सद्गुरु की शरण मिल जाए और हृदय में नाम का प्रकाश हो जाए तो जप, तप तीर्थ सभी उसमें आ जाते हैं, फिर किसी भी अन्य कर्म करने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती।
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