आपने
अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अनुपम उपदेश को अति श्रद्धा से हृदय
में धारण कर लिया था, अब इस भावना को और नवसाहस मिल गया। आप अपने ध्येय की
प्राप्ति के लिए तन-प्राण से जुट गए। आप टेरी से लौटे तो आपके हृदय में
गुरु-भक्ति एवं प्रेम की लहरें तरंगित हो उठीं। आप उन लहरों में खो गए।
उस समय आपकी आयु लगभग बीस-इक्कीस वर्ष की होगी जब आपने इंद्रियों पर संयम
कर मन को परास्त करने के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की श्री आज्ञा व
मौज में पूर्ण रूप से ध्यान जोड़ दिया। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री
दूसरी पादशाही जी) उस समय टांक, कुलाची, डेरा इस्माइलखां, आदि नगरों को,
सत्संग से कृतार्थ कर रहे थे। इधर आप भजनाभ्यास द्वारा आंतरिक मंज़िंलों को
पार करने में लगे हुए थे। सन्त महापुरुष तो स्वयं आत्म प्रकाशक होते हैं,
केवल जन साधारण के लिए उन नियमों को स्वयं अपनाते हैं, जो कार्य अन्य लोगों
से करवाने हों। सन्त महापुरुषों के सिद्धान्त सर्वसाधारण के लिए पगडंड़ी
बनते हैं। आप कई-कई घण्टे तक योगाभ्यास में मग्न रहते। श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी की मिलन की लगन तो हर समय आपको दीवाना बनाये रखती। जब भी श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी लक्की मरवत् अथवा अन्य निकटवर्ती स्थानों पर कृपा
करते तो आप कई कई दिनों तक श्री चरणों में सेवा के लिए उपस्थित रहते और
श्री दर्शन के मधुर-मधुर अमृत का रसपान करते।
आपके पूज्य पिता जी भक्ति भाव तथा कर्म धर्म के विचारों को तो पहले से ही
रखते थे, अब आप उनको बहुधा गुरु-भक्ति के विषय में उपदेश करते। आपकी
सत्प्रेरणा का प्रभाव शीघ्र पूज्य पिता जी पर पड़ा। आपने अपने पिता जी को
भी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री दर्शन कराये और उन्हें भी सद्गुरु
उपदेश से दीक्षित कराया।
आपका अपना विचार यह था कि पिता जी शीघ्र ही चरणों में सर्वस्व समर्पण कर
शरणागत हो जायें। जिस दिन आपने गुरु-दीक्षा ली, मन से तो उसी दिन से ही सब
कुछ श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को सौंप दिया, परन्तु बाहरी रूप से अभी शरण
प्राप्त नहीं की थी। आपके हृदय की यह प्रबल अभिलाषा थी कि पिता जी भी श्री
दरबार में शरणागत हो जायें तो घर की सारी सम्पत्ति भी परमार्थ (श्री दरबार )
में लगा दी जाये। अतः आप अपने पिता जी से बहुधा कहा करते थे- ''पिता जी !
आप वृद्धावस्था में पदार्पण कर चुके हैं। अतएव अच्छा हो यदि आप सांसारिक
जंजाल को त्याग कर जीव के अन्तिम दिनों में सन्यास धारण कर लें तथा
भजन-भक्ति में मन लगावें।''
No comments:
Post a Comment