श्री आनन्दपुर ट्रस्ट
श्री श्री 108
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने एक महत्त्वपूर्ण
कार्य यह किया कि अपने शरणागतों की व भक्तों की श्रद्धा भक्ति पूर्वक भेंट
की गई चल व अचल सम्पत्ति की रक्षा के लिए दिनांक 22 अप्रैल सन् 1954 ई0 तदनुसार 10 वैशाख संवत् 2011 विक्रमी को "श्री आनन्दपुर ट्रस्ट' के नाम से एक संस्था की स्थापना की जिसमें शरणागतों, महात्माओं, भक्तों व सेवकों के पालन-पोषण, देख-रेख
तथा सुरक्षा के सम्पूर्ण अधिकार एक ट्रस्टी-समिति को सौंप दिए गए। इस
ट्रस्टी समिति अथवा बोर्ड आफ़ ट्रस्टीज़ के सदस्य कुछ महात्माजन तथा कुछ
भक्तजन हैं जिनकी पूर्ण संख्या छत्तीस है।
इस ट्रस्ट के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं----
1. श्री परमहंस अद्वैत मत के सिद्धान्तों को निष्ठापूर्वक जन-जन तक पहुँचाना।
2. भक्ति-पथ पर चलनेवाले जिज्ञासुओं की आत्मिक उन्नति व मनःशान्ति के लिए भजनाभ्यास तथा सत्संग आदि के विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करना।
3. जनसाधारण को मानुष जन्म के लक्ष्य का बोध कराना तथा आध्यात्मिक लाभ पहुँचाना।
4. आश्रम की चल व अचल सम्पत्ति की सुरक्षा करना।
5. आश्रम के स्थायी निवासियों के शारीरिक निर्वाह हेतु (भोजन, वस्त्र, आवासगृह आदि का) उचित प्रबन्ध करना।
6. आश्रम में आनेवाले दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए आवासगृह एवं भोजन आदि का निःशुल्क प्रबन्ध करना।
7. आश्रमवासी व समीपवर्ती लोगों की सुविधा के लिए आधुनिक धर्मार्थ चिकित्सालय एवं पाठशाला स्थापन करना।
8. स्वाध्याय के लिए धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करना।
इन सब उद्देश्यों की पूर्ति श्री आनन्दपुर ट्रस्ट द्वारा अत्यन्त सुचारु रूप से की जा रही है।
आनन्द भवन शिमला
आपकी मौज कई मौजों का भण्डार थी। आपने क्या-क्या किया और क्या करना चाहते थे, इसका
अनुमान लगाना कठिन है। एकान्त व शान्त वातावरण आपको अत्यधिक प्रिय था।
श्री आनन्दपुर का कण-कण आपके चरण स्पर्श करने के लिए लालायित था कि श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी अपनी कृपादृष्टि से हमारे भी भाग्य जगायें। अत: सन् 1955 ई0
में आबादी के उत्तर-पूर्वी भाग में एक ऊँची पहाड़ी ने श्री चरणों में
सौभाग्यवती बनने की विनय की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ महात्मा व
भक्तजनों सहित यहां पधारे। पहाड़ी को ऊपरी सिरे से कटवाना आरम्भ करवाया।
यहां पर कुछ महात्माजन, भक्तजन व प्रेमी जिज्ञासु इस सेवा में सम्मिलित होते और रात्रि को कुछ एक को छोड़कर वापस घर लौट आते।
इसी समय में जबकि आनन्द भवन शिमला को आबाद किया जा रहा था, एकबार
श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी वहां महुआ के पेड़ के नीचे पलंग पर विराजमान थे।
दो चार सेवक समीप की फुलवाड़ी में सेवा कर रहे थे। दो निजी सेवक श्री चरणों
में बैठकर पुस्तक सुना रहे थे। नीचेवाली मंज़िल जहां सेवा का कार्य हो रहा
था, पहाड़ी को एक सिरे से काटकर बुनियाद
खोदी जा रही थी। एक ओर तो ऊँची पहाड़ी थी और दूसरी तरफ़ एक खड्ड था। खुदाई
होते हुए पहाड़ी में दरार पड़ गई और एकदम ही पहाड़ी का एक भाग नीचे आ गया।
धमाके की आवाज़ होते ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने एकदम नंगे पांव ही
वहां शीघ्रता से कृपा की। उनके पीछे-पीछे सेवक भी भागते चले आए। खुदाई की
सेवा करनेवाली संगत आश्चर्यचकित एक ओर खड़ी थी। श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने
पूछा----कोई नीचे तो नहीं आ गया? जाँच-पड़ताल
करने पर मालूम हुआ कि एक भक्त कम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के संकेत
से मिट्टी हटाई गई और उसे बाहर निकाला गया। मिट्टी हटाने पर देखा गया कि वह
भक्त बेहोश था। पहाड़ी का इतना भाग नीचे गिरने पर भी उसे कोई चोट नहीं आई
थी। कुछ समय के पश्चात् वह भक्त होश में आया। उस भक्त से पूछने पर उसने
बताया कि जब पहाड़ी मेरे ऊपर गिरी तो श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी भागते हुए आए
और उन्होंने मुझे अपनी गोद में ले लिया। उसके बाद मुझे कुछ पता न चला। बाद
में होश में आने पर उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में
दण्डवत्-प्रणाम कर विनय की कि आपको मेरे लिए बहुत कष्ट उठाना पड़ा। सब संगत
प्रसन्नता में जयकारे बोलने लगी। सब संगत ने उस समय कहा कि ""धन्य हैं
श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी! जो सदा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।''
इसी पहाड़ी के एक ओर से चढ़ने के लिए ढलान का मार्ग और दूसरी ओर से सीढ़ियां बनवार्इं। इस प्रकार से यह एक रमणीक स्थान बन गया।