Tuesday, November 15, 2016

14.11.2016

श्री आनन्दपुर ट्रस्ट
श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह किया कि अपने शरणागतों की व भक्तों की श्रद्धा भक्ति पूर्वक भेंट की गई चल व अचल सम्पत्ति की रक्षा के लिए दिनांक 22 अप्रैल  सन् 19540 तदनुसार 10 वैशाख संवत् 2011 विक्रमी को "श्री आनन्दपुर ट्रस्ट' के नाम से एक संस्था की स्थापना की जिसमें शरणागतों, महात्माओं, भक्तों व सेवकों के पालन-पोषण, देख-रेख तथा सुरक्षा के सम्पूर्ण अधिकार एक ट्रस्टी-समिति को सौंप दिए गए। इस ट्रस्टी समिति अथवा बोर्ड आफ़ ट्रस्टीज़ के सदस्य कुछ महात्माजन तथा कुछ भक्तजन हैं जिनकी पूर्ण संख्या छत्तीस है।
इस ट्रस्ट के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं----
1. श्री परमहंस अद्वैत मत के सिद्धान्तों को निष्ठापूर्वक जन-जन तक पहुँचाना।
2. भक्ति-पथ पर चलनेवाले जिज्ञासुओं की आत्मिक उन्नति व मनःशान्ति के लिए भजनाभ्यास तथा सत्संग आदि के विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करना।
3. जनसाधारण को मानुष जन्म के लक्ष्य का बोध कराना तथा आध्यात्मिक लाभ पहुँचाना।
4. आश्रम की चल व अचल सम्पत्ति की सुरक्षा करना।
5. आश्रम के स्थायी निवासियों के शारीरिक निर्वाह हेतु (भोजन, वस्त्र, आवासगृह आदि का) उचित प्रबन्ध करना।
6. आश्रम में आनेवाले दर्शनार्थियों की सुविधा के लिए आवासगृह एवं भोजन आदि का निःशुल्क प्रबन्ध करना।
7. आश्रमवासी व समीपवर्ती लोगों की सुविधा के लिए आधुनिक धर्मार्थ चिकित्सालय एवं पाठशाला स्थापन करना।
8. स्वाध्याय के लिए धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन करना।
इन सब उद्देश्यों की पूर्ति श्री आनन्दपुर ट्रस्ट द्वारा अत्यन्त सुचारु रूप से की जा रही है।


आनन्द भवन शिमला
आपकी मौज कई मौजों का भण्डार थी। आपने क्या-क्या किया और क्या करना चाहते थे, इसका अनुमान लगाना कठिन है। एकान्त व शान्त वातावरण आपको अत्यधिक प्रिय था। श्री आनन्दपुर का कण-कण आपके चरण स्पर्श करने के लिए लालायित था कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी  अपनी कृपादृष्टि से हमारे भी भाग्य जगायें। अत: सन् 19550 में आबादी के उत्तर-पूर्वी भाग में एक ऊँची पहाड़ी ने श्री चरणों में सौभाग्यवती बनने की विनय की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ महात्मा व भक्तजनों सहित यहां पधारे। पहाड़ी को ऊपरी सिरे से कटवाना आरम्भ करवाया। यहां पर कुछ महात्माजन, भक्तजन व प्रेमी जिज्ञासु इस सेवा में सम्मिलित होते और रात्रि को कुछ एक को छोड़कर वापस घर लौट आते।
इसी समय में जबकि आनन्द भवन शिमला को आबाद किया जा रहा था, एकबार श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी वहां महुआ के पेड़ के नीचे पलंग पर विराजमान थे। दो चार सेवक समीप की फुलवाड़ी में सेवा कर रहे थे। दो निजी सेवक श्री चरणों में बैठकर पुस्तक सुना रहे थे। नीचेवाली मंज़िल जहां सेवा का कार्य हो रहा था, पहाड़ी को एक सिरे से काटकर बुनियाद खोदी जा रही थी। एक ओर तो ऊँची पहाड़ी थी और दूसरी तरफ़ एक खड्ड था। खुदाई होते हुए पहाड़ी में दरार पड़ गई और एकदम ही पहाड़ी का एक भाग नीचे आ गया। धमाके की आवाज़ होते ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने एकदम नंगे पांव ही वहां शीघ्रता से कृपा की। उनके पीछे-पीछे सेवक भी भागते चले आए। खुदाई की सेवा करनेवाली संगत आश्चर्यचकित एक ओर खड़ी थी। श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पूछा----कोई नीचे तो नहीं आ गया? जाँच-पड़ताल करने पर मालूम हुआ कि एक भक्त कम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के संकेत से मिट्टी हटाई गई और उसे बाहर निकाला गया। मिट्टी हटाने पर देखा गया कि वह भक्त बेहोश था। पहाड़ी का इतना भाग नीचे गिरने पर भी उसे कोई चोट नहीं आई थी। कुछ समय के पश्चात् वह भक्त होश में आया। उस भक्त से पूछने पर उसने बताया कि जब पहाड़ी मेरे ऊपर गिरी तो श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी भागते हुए आए और उन्होंने मुझे अपनी गोद में ले लिया। उसके बाद मुझे कुछ पता न चला। बाद में होश में आने पर उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के श्री चरणों में दण्डवत्-प्रणाम कर विनय की कि आपको मेरे लिए बहुत कष्ट उठाना पड़ा। सब संगत प्रसन्नता में जयकारे बोलने लगी। सब संगत ने उस समय कहा कि ""धन्य हैं श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी! जो सदा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं।''
इसी पहाड़ी के एक ओर से चढ़ने के लिए ढलान का मार्ग और दूसरी ओर से सीढ़ियां बनवार्इं। इस प्रकार से यह एक रमणीक स्थान बन गया।

Monday, November 14, 2016

09.11.2016

श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने इस साधु श्रेणी में से कुछ को सत्संग-प्रचार के लिए भेज दिया ताकि ये नाम की अमर ज्योति शीघ्रातिशीघ्र भारत के कोने- कोने में फैलाएँ। प्रत्येक ग्राम तथा नगर में सत्संग आश्रम निर्माण करने का आदेश दिया और विशेषकर यह प्रवचन उसी दिन ही फ़रमाए----
""जब तक मनुष्य अपना जीवन उन नियमों के सांचे में नहीं ढाल लेता, जिन नियमों पर वह दूसरों को चलाना चाहता है, तब तक उसका प्रभाव पूर्ण रूप से दूसरों पर नहीं पड़ता। अपना आचरण ही दूसरों पर प्रभाव डालने के लिए उपदेश की अपेक्षा अत्यधिक प्रभावशाली होता है। अपने आचरण में कमी ही केवल वाचक ज्ञान बनकर रह जाती है, जिसका प्रभाव श्रोताओं पर पूर्णरूप से नहीं हो सकता। गुरुवाणी में भी कहा है----
अवर उपदेसै आपि न करै ।। आवत जावत जनमै मरै ।।
दूसरों को उपदेश देना या केवल दिखावा-मात्र काम करना, यह विचार केवल मान-बड़ाई और इज़्ज़त के लिए ही होता है कि लोग हमारी पूजा करें। जिन्होंने अमली तौर पर कुर्बानी की होती है, उनका प्रभाव लोगों पर स्वयं ही पड़ता है। इसीलिए पहले स्वयं आचरण करो, पुन: दूसरों को उपदेश दो तो उसका प्रभाव सबपर अधिक पड़ेगा, वरना आप आचरण न करने से दूसरों का कल्याण करने की अपेक्षा स्वयं ही आवागमन के चक्र में फंस जायेगा।
सेवक बनकर सद्गुरु की ओर से परमार्थ का सन्देश लोगों तक पहुँचाओ। उनकी तरफ़ से जो सेवा-भेंट हो उसे सद्गुरु की भेंट समझो। वह सब सेवा सद्गुरु के चरणों में भेंट करने की होती है ताकि अपनी ममता या अहंता किसी वस्तु में न हो। औरों को उपदेश देने का यह अभिमान नहीं करना कि मैं विद्वान् हूँ, मैं गुणवान् हूँ, मैं चतुर हूँ और मेरे ही उपदेश से मेरी मान्यता होती है। यह सरासर ग़लती और कमज़ोरी है।
जिसके ज़िम्मे सद्गुरु की ओर से जो सेवा लगी हो यदि वह स्वयं उसका मालिक बन बैठे तो उसकी यह हालत होती है कि----
।। दोहा ।।
सिष साखा बहुते किये, सतगुरु किया न मीत ।।
चाले थे सतलोक को, बीचहि अटका चीत ।।
                                     परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
तुम साधु हो। तुम लोगों में यह कमज़ोरी नहीं होनी चाहिये। यहां पर भी जिस महात्मा या भक्त को सत्संग-प्रचार की आज्ञा दी जावे, उसे दृढ़ता से समझ लेना चाहिये कि यह सेवा सद्गुरु की ओर से उसे सौंपी गई है। यदि सत्संग करनेवाला यह चाहे कि मेरी मान्यता हो, लोग मेरी प्रशंसा करें तो वह गिरावट की ओर जायेगा। स्वयं आचरण करता चला जाये, उसका प्रभाव स्वयं लोगों पर पड़ेगा।
श्री आनन्दपुर में भी जो महात्माजन सत्संग करते हैं, वे इसे अपनी सेवा ही समझें। इसी तरह हर सत्संगी चाहे वह श्री आनन्दपुर में है या बाहर सत्संग करता है, वह अपने आपको सेवक ही समझे। श्रोतागणों को चाहिये कि वे यह समझें कि हमें महापुरुषों के वचन सुनाये जा रहे हैं जिनपर हमने आचरण करना है।
ऐसा करने पर दोनों श्रोता और वक्ता श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा के पात्र बनकर अपने जीवन को सफल करेंगे।''
इस प्रकार से साधु मण्डली श्री अमृत प्रवचनों का रसपान कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अमर सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सेवा में जुट गई। स्थान-स्थान पर जाकर आश्रम स्थापित किये। भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तक व पूर्व से पश्चिम तक इस अमृत को उड़ेला, यहां तक कि विदेश में भी इस कलिमलहारिणी त्रि-ताप विनाशिनी भक्ति का सन्देश पहुँचाया।

Wednesday, November 9, 2016

09.11.2016

जब-जब भी आप कुछ दिनों के लिए जनकल्याण हेतु बाहर जाते तो  श्री आनन्दपुर के प्रेमी, शरणागत उन दिनों आपके वचनानुसार सेवा में तथा आपकी याद में एक-एक क्षण चकोर की न्यार्इं बाट जोहने में लगाते। जब आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) की कार सुरीले मनहरण हार्न करती हुई वापस आती तो श्री आनन्दपुर की धरती का कण-कण और प्रेमियों के ह्मदय शरद्-पूर्णिमा के विधु को पाकर कैरव कुसुम की तरह खिल उठते। कार के हार्न ज़मीन व आसमान को बाँसुरी की धुन की न्यार्इं गुँजा देते। प्रेम दीवाने उस प्रेम की मधुरिमा को पाकर पुन: मस्ती में झूम उठते। श्री आनन्दपुर तो मानो यह चाहता कि मेरा एक-एक कण श्री चरण-कमलों से पवित्र हो ताकि मैं भी अपने सौभाग्य पर इठलाऊँ।
श्री आनन्दपुर में शरणागतों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। जितनी शरणागतों की संख्या बढ़ती उतना ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त प्रसन्न होते, क्योंकि उनकी जन्मों से बिछुड़ी हुई रूहें अपने धाम में पहुँच रही थीं, जिनके लिए वे सब रचनाएँ रच रहे थे। वे उच्च संस्कारी तथा आतुर प्रेमियों को अर्थात् रूहों को जो आपके श्रीचरणों में शरणागत होना चाहती थीं या भक्ति की अभिलाषी थीं, उन्हें निज स्थान पर पहुँचा हुआ देख तथा अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचनों को पूरा होता देखकर प्रसन्न हो रहे थे। अत्यधिक प्रसन्नता आपको इसलिए हुई कि आप जिस कार्य को पूरा करना चाहते थे, वह सम्पूर्ण हो रहा था।
इस प्रकार श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने यथासम्भव साधनों से सर्वसाधारण को भी प्रेम-भक्ति का अमृत पिलाया। जिन जीवों के ह्मदय में गुरु-भक्ति की लगन जागरूक हो चुकी थी तथा जो श्री दरबार में शरणागति लेना चाहते थे, उनकी अटूट निष्ठा को देखकर उन्हें चरण-शरण प्रदान की तथा जो संस्कारी आत्माएँ आपकी विमल भक्ति में लगन बढ़ाती हुई संसार में रह रही थीं, आप उनके अन्तर्मानस की जानते हुए उन्हें उसी अनुरूप  श्री प्रवचनामृत पान कराकर उनकी भक्ति बना रहे थे।
भक्त धर्मभानु जी जोकि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अनन्य प्रेमी व उच्च संस्कारी आत्मा थे, उनका कथन है कि मैं दिल्ली में रहता था तथा सभा- समाजों में व्याख्यान दिया करता था। ग्रीष्मावकाश होने पर मैं प्राय: श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर आ जाया करता था। गर्मियों की छुट्टियां श्री दरबार की सेवा में ही व्यतीत होती थीं।
जब मैं यहां पहुँचा और श्री दर्शन की आज्ञा पाकर अन्दर श्री चरणों में उपस्थित हुआ----तब श्री भगवान अकेले अपनी पवित्र मौज में पलंग पर विराजमान थे। श्रद्धापूर्वक साष्टांग दण्डवत्-प्रणाम किया और ज्योंही आज्ञा पाकर मैंने श्री पदारविन्दों में सिर रखकर आँखें उठार्इं तो सहसा श्री सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया---""सत्संग होता है?'' मैं असमञ्जस में पड़ गया कि क्या उत्तर                दूँ। महाप्रभु जानते थे कि मैं सभा-समाजों में बहुत व्याख्यान दिया करता                       हूँ, इसी विचार से ही श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पूछ लिया कि ""सत्संग होता  है।''
मैं तो यह प्रश्न सुनकर स्तब्ध सा हो गया। मुख से मेरे कोई उत्तर न निकल सका। इसपर श्री प्रवचन हुए कि ""सत्संग नहीं होता, क्योंकि किसी पुस्तक का पाठ कर देने को "सत्संग' नहीं कहते। पुस्तकों तथा ग्रन्थों की वाणी पढ़कर सुनाना, उसके अर्थ करना, परन्तु उसपर आचरण न करना---इसे "सत्संग' नहीं कहते। तब महाप्रभु ने बड़ी ही गम्भीर मुद्रा धारण की और अत्यन्त शान्तिपूर्वक समझाने लगे कि सत्संगउसद्वस्तु का संग कराना। सत् से मिलाप हो जाना। सत् से मेल कौन कराता है? इन विविध पुस्तकों की पंक्तियों का पाठ करके इनपर चिन्तन करो, तब पता चलता है कि ये धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सत्-वस्तु से संग करना चाहिये। सत् का ज्ञान महापुरुषों से होता है। अत: सन्त महापुरुषों से मिलाप कर सत्-असत् का ज्ञान कराना ही सत्संग होता है। अत: अब सत्संग भी किया करो।''
इन श्री प्रवचनों में कितना रहस्य छिपा है कि एक तो महापुरुष जीव को असत् से सत् देश की ओर ले जाते हैं, दूसरा आपने यह स्पष्ट करा दिया कि भक्त धर्मभानु जी केवल महाभारत, रामायण का पाठ ही सभा-समाजों में न किया करें, अपितु इनका वास्तविक अर्थ समझाया करें जिससे अन्य जीव भी इन ग्रन्थों के रहस्य को समझकर सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त करें तथा अपने मानव जीवन का पूर्णतया लाभ उठा सकें।
इस प्रकार से आपने शरणागतों तथा अन्य प्रेमी जिज्ञासुओं को अपने अपने ढंग से ही लाभ पहुँचाया।
शरणागत प्रेमी गुरुमुखों में से कुछ शरणागत साधु-वेष ग्रहण करने के लिए बार-बार विनय करते। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ अधिकारी गुरुमुखों को साधु-वेष प्रदान करते। जब ये साधु-वेष लेकर श्री चरणों में पुष्प-पत्रादि भेंट करने के लिए आते तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त हर्षित हो प्रसाद बंटवाते, उनकी खुशी का ठिकाना न रहता।

Friday, November 4, 2016

04.11.2016

उसी दिन सायं समय आपने जयपुर में कृपा की। महात्मा परम विवेकानन्द जी ने स्वागत के रूप में काफ़ी तैयारियां की हुई थीं। श्री सद्गुरुदेव महाराज   जी ने सेठ जी की कोठी में कृपा की। दिन-रात सत्संग की पावन धारा बहाने लगे। उसी दिन रात्रि समय भक्त लोग उस सेठ को भी श्री दर्शन के लिए बुला कर ले आये। आपके सम्मुख आते ही उसने अपनी तन-बदन की सुधि खो दी। श्री दर्शन ने उसे ऐसा मतवाला बना दिया कि वह श्री छवि को देखते ही समस्त वृत्तियों को खो बैठा। आप उस समय प्रवचन फ़रमा रहे थे----""इन्सान माया का परवाना बना हुआ है। यदि कभी इस माया को पीठ दे तो पता चले कि यह छाया की भाँति उसके पीछे कैसे दौड़ती है। इन मायावी सामानों में जीव ने सुरति इस क़दर फँसा दी है कि इसे इसके परिणाम का पता ही नहीं कि क्या होगा? धन में सुरति लगाने से अन्त में सर्प की योनि मिलती है। मकान में सुरति फँसाने से भूत-प्रेत की योनि प्राप्त होगी। यदि सुरति पुत्र में अटकी रह जायेगी तो सूअर का जन्म मिलेगा। इसी प्रकार अन्यान्य योनियों का जीव शिकार बनकर चौरासी का चक्र ख़रीद लेता है। यदि यही सुरति सन्त महापुरुषों के दिये हुए सच्चे नाम से जोड़ी जाये तो अन्तिम समय यह सुरति प्रभु के धाम में पहुँचा देगी जहां पहुँच कर आवागमन के चक्र से छुटकारा मिल जाता है। परन्तु जीव के लिए स्वयं ऐसा काम करना कठिन है। सन्त महापुरुषों की संगति से ही जीव को ऐसा ज्ञान मिलता है। सन्त महापुरुष जीव को वचनामृत द्वारा सदा सावधान करते हैं।
वैसे तो जिस धरती पर सन्त महापुरुष स्वयं कृपा करते हैं उस धरती का वातावरण निर्मल बन जाता है। उनके पावन वचनामृत श्रवण करने से मन की चंचल वृत्तियां शिथिल हो जाती हैं। मन स्वयं भक्ति मार्ग को अपना लेता है। सन्त महापुरुषों की संगति ही जीव के विचारों में परिवर्तन ला सकती है। अत: सन्त महापुरुषों का समागम अत्यावश्यक है। मनुष्य सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त कर अपना कल्याण करे।''
ये वचन सेठ जी के मन पर बाण की तरह लगे। उसने सोचा कि शायद यह महापुरुष मेरे लिए ही वचन फ़रमा रहे हैं। सन्त महापुरुष तो स्वाभाविक ही ऐसे वचन फ़रमाते हैं जो जीव के संकल्प-विकल्पों को मिटा दें। सत्संग समाप्त हुआ। सब संगत अपने-अपने घर लौट गई, किन्तु सेठ जी वहीं बैठे रहे। सेठ जी के जन्म-जन्मान्तरों के कलुष जैसे एक पल में ही धुल गये। उसे अपने दिलरूपी दर्पण में जैसे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दिखाई देने लगे।
संगत के जाने के बाद उसने आपके सुकोमल चरणों में वन्दना कर अपने अपराधों की क्षमा मांगी तथा विनय की कि मैंने यहां के भक्तों से कहा था कि अभी मैंने अपनी कोठी का उद्घाटन नहीं करवाया। बिना उद्घाटन के कोठी तुम्हें कैसे दे दूँ। अब मैं अपना विचार प्रकट करता हूँ कि जिन महापुरुषों की वाणियों का पाठ करवाकर मैंने मुहूत्र्त करवाना था, वे महापुरुष (आप) साक्षात् हमारे घर में पधारे हैं अथवा जिन देवताओं का पूजन करना था उन देवताओं के देव ने आज स्वयं यहां कृपा फ़रमाई है। मेरे जैसा भाग्यशाली कौन होगा? आपके श्री दर्शन के लिए हज़ारों मीलों से प्रेमी आते हैं, उनको भी एकान्त में इतना समय आपके श्री दर्शन करने का शायद ही नसीब होता होगा जितना मुझे मिल रहा है। आपके श्री दर्शन तथा अमृत-वचनों ने मेरा कठोर ह्मदय मोम की तरह नर्म कर दिया है। मैं किस मुख से आपकी महिमा का वर्णन करूँ। आप साक्षात् भगवान हैं। हम जैसे जीवों को आप दिव्य दृष्टि देकर सत् और असत् की परख कराने आए हैं। मैं अपने मन की अवस्था को बदला हुआ देखकर स्वयं हैरान हूँ कि मेरे विचारों में धरती और आकाश का सा अन्तर इतनी शीघ्रता से कैसे आ गया ? आप दयालु हैं; आप अपनी कृपा-दृष्टि से जीव को भक्ति रूपी धन से मालामाल कर सकते हैं। जैसे गुरुवाणी का वचन है----
साचे   साहिबा   किआ   नाही   घरि   तेरै ।।
घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावहि ।।
यह बात आज प्रत्यक्ष मैंने देख ली। मेरी जिह्वा में यह शक्ति नहीं कि आपकी महिमा का गायन कर सकूँ। धन्य हैं गुरुदेव। उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी से नाम-दीक्षा ली और कृतकृत्य हो गया।
अब उसने अपने सम्बन्धियों से भी यह कह दिया कि मेरी कोठी का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हुआ है। उसने फिर उस कोठी का उद्घाटन कभी न करवाया। इतना प्रताप है एक पल की श्रेष्ठ संगति का। यदि जीव निरन्तर सन्त महापुरुषों की संगति करता रहे तो कितना लाभ होगा, इसका अनुमान कहां लगाया जा सकता है? जब आप नित्यप्रति पावन सत्संग की गंगा में सर्वसाधारण को मज्जन करवाकर चार-पांच दिन के पश्चात् श्री आनन्दपुर लौटने लगे तो सेठ जी ने एक-दो दिन और रहने का आग्रह किया। यह विनय भी की----दीनदयाल! हम जीवों के अवगुणों को न निहारते हुए इस भवन को अपना ही समझकर यहां पधारने की कृपा करते रहियेगा। यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है। आप उस स्थान को कृतार्थ कर और आशिष से उसके दामन को भरकर श्री आनन्दपुर में पधारे।

Wednesday, November 2, 2016

02.11.2016

इसमें श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी एवं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी के समय-समय पर होने वाले श्री अमृत प्रवचन तथा अन्य महात्माओं के भक्ति-ज्ञान-वैराग्य से युक्त विचारों को एकत्रित कर कथा, लेख, भजन, श्री अमर वाणी आदि विभिन्न रूपों में प्रकट किया जाता है, जिसे पढ़ कर प्रेमियों को असीम लाभ हुआ और हो रहा है। इसे ज्योति-स्तम्भ कहा जाए तो अनुपयुक्त न होगा। यह पूर्ण सन्त महापुरुषों के मिलाप का एक साधन है। साधक के लिए पथ-प्रदर्शक है। इसी से जीवन के आनन्द रूपी संदेश को प्राप्त कर सर्वसाधारण भी लाभान्वित हो रहे हैं।
श्री आनन्दपुर दरबार की संगतें व अन्य जीवों को भारत में तथा विदेशों में जहां-जहां भी भक्ति के जिज्ञासु थे और हैं, सबको यह आनन्दमय सन्देश पहुँचाता रहा और पहुँचा रहा है। इसने जीवन में नया रंग, नई उमंग, नया साहस, भक्ति की प्रतिभाशाली तरंग तरंगित करने का कार्य पूर्ण रूप से निभाया और निभा रहा है। इस मासिक पत्र "आनन्द सन्देश' के प्रकाशन के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री आनन्दपुर सत्संग आश्रम में "आनन्द पिं्रटिंग प्रेस' स्थापित करवा दिया। आनन्द सन्देश के साथ-साथ यहाँ धार्मिक पुस्तकें जैसे भक्ति सागर, भक्ति दीपक, सार-उपदेश, आनन्द रामायण तथा अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित की गर्इं।
इसके पश्चात् श्री श्री 108 श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी ने आत्मिक सम्पदा का एक विशेष अमूल्य उपहार "श्री परमहंस अद्वैत मत' (अमर ज्योति) ग्रन्थ---प्रेमी, गुरुमुखों एवं भक्ति की अभिलाषी आत्माओं को प्रदान किया, जिसमें श्री आनन्दपुर के उन्नायक श्री परमहंस महान् विभूतियों का जीवन-चरित लिखा हुआ है। इसे पढ़ने से ह्मदय दिव्य आलोक से आलोकित हो उठता है तथा परम सुख एवं आनन्द की अनुभूति होती है। इसका प्रथम संस्करण अप्रैल सन् 1972 में प्रकाशित हुआ। परमार्थ, भक्ति एवं आत्मोन्नति के उच्च सिद्धान्तों को सम्मुख रखकर प्रेमियों की मांग को पूरा करने के लिए आप समयानुसार धार्मिक पुस्तकों का निरन्तर प्रकाशन करवा रहे हैं।
मई सन् 1973 में विदेश में निवास करने वाले गुरुमुखों की मांग को पूर्ण करने के लिए ‘‘‘च्र्ण्ड्ढ च्द्रत्द्धत्द्यद्वठ्ठथ् एथ्त्द्मद्म’  के नाम से अंग्रेज़ी भाषा में मासिक पत्रिका का प्रकाशन करवाया जिससे भारत तथा विदेश में रहने वाले गुरुमुखों को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो रहा है। इसके साथ-साथ अन्य इंग्लिश पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। अब इस आनन्द पिं्रटिंग प्रेस में श्री आनन्दपुर दरबार की ओर से हिन्दी, सिन्धी तथा अंग्रेज़ी भाषा में धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन होता है, जिनको पढ़कर जनसाधारण भी लाभ उठा रहे हैं।
इसी प्रकार आप श्री आनन्दपुर के कार्य की देखरेख करते हुए अन्य स्थानों पर जनकल्याण हेतु जाते थे। एक बार 1953 में आप राजस्थान की ओर पधारे। छबड़ा गुगर, कोटा से होते हुए अजमेर पहुँचे। वहां जयपुर की संगत ने विनय की कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी जयपुर को भी पवित्र करने की कृपा करें। उन लोगों की नम्रता, श्रद्धा व प्रेम को देखकर कृपालु भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। आपने दो दिन पश्चात् जयपुर पधारने का उन्हें वचन दिया।
अब जयपुर की संगत व महात्मा परम विवेकानन्द जी परस्पर सलाह करने लगे कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के ठहरने के लिए एक ऐसा विशाल भवन होना चाहिये जहां जयपुर की संगत आकर श्री दर्शन का लाभ उठा सके। उन्होंने अत्यधिक खोज की। ढूँढ़ने पर पता चला कि एक सेठ ने एक नई कोठी बनवाई है, परन्तु वह सेठ श्रद्धालु न था। जयपुर के एक भक्त सत्संगी की उससे जान-पहचान थी। उसने सेठ जी के साथ चर्चा की कि हमारे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दो-तीन दिन के लिए जयपुर पधार रहे हैं। अगर आप अपनी नई कोठी उनके ठहरने के लिए दे देवें तो बहुत अच्छा होगा। सेठ जी ने कहा कि अभी तो मैंने उसका उद्घाटन ही नहीं करवाया। भक्तों ने कहा कि तीन-चार दिन बाद करवा लेना। उनके आग्रह पर सेठ जी ने कोठी भक्त जनों को सौंप दी।