Friday, November 4, 2016

04.11.2016

उसी दिन सायं समय आपने जयपुर में कृपा की। महात्मा परम विवेकानन्द जी ने स्वागत के रूप में काफ़ी तैयारियां की हुई थीं। श्री सद्गुरुदेव महाराज   जी ने सेठ जी की कोठी में कृपा की। दिन-रात सत्संग की पावन धारा बहाने लगे। उसी दिन रात्रि समय भक्त लोग उस सेठ को भी श्री दर्शन के लिए बुला कर ले आये। आपके सम्मुख आते ही उसने अपनी तन-बदन की सुधि खो दी। श्री दर्शन ने उसे ऐसा मतवाला बना दिया कि वह श्री छवि को देखते ही समस्त वृत्तियों को खो बैठा। आप उस समय प्रवचन फ़रमा रहे थे----""इन्सान माया का परवाना बना हुआ है। यदि कभी इस माया को पीठ दे तो पता चले कि यह छाया की भाँति उसके पीछे कैसे दौड़ती है। इन मायावी सामानों में जीव ने सुरति इस क़दर फँसा दी है कि इसे इसके परिणाम का पता ही नहीं कि क्या होगा? धन में सुरति लगाने से अन्त में सर्प की योनि मिलती है। मकान में सुरति फँसाने से भूत-प्रेत की योनि प्राप्त होगी। यदि सुरति पुत्र में अटकी रह जायेगी तो सूअर का जन्म मिलेगा। इसी प्रकार अन्यान्य योनियों का जीव शिकार बनकर चौरासी का चक्र ख़रीद लेता है। यदि यही सुरति सन्त महापुरुषों के दिये हुए सच्चे नाम से जोड़ी जाये तो अन्तिम समय यह सुरति प्रभु के धाम में पहुँचा देगी जहां पहुँच कर आवागमन के चक्र से छुटकारा मिल जाता है। परन्तु जीव के लिए स्वयं ऐसा काम करना कठिन है। सन्त महापुरुषों की संगति से ही जीव को ऐसा ज्ञान मिलता है। सन्त महापुरुष जीव को वचनामृत द्वारा सदा सावधान करते हैं।
वैसे तो जिस धरती पर सन्त महापुरुष स्वयं कृपा करते हैं उस धरती का वातावरण निर्मल बन जाता है। उनके पावन वचनामृत श्रवण करने से मन की चंचल वृत्तियां शिथिल हो जाती हैं। मन स्वयं भक्ति मार्ग को अपना लेता है। सन्त महापुरुषों की संगति ही जीव के विचारों में परिवर्तन ला सकती है। अत: सन्त महापुरुषों का समागम अत्यावश्यक है। मनुष्य सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त कर अपना कल्याण करे।''
ये वचन सेठ जी के मन पर बाण की तरह लगे। उसने सोचा कि शायद यह महापुरुष मेरे लिए ही वचन फ़रमा रहे हैं। सन्त महापुरुष तो स्वाभाविक ही ऐसे वचन फ़रमाते हैं जो जीव के संकल्प-विकल्पों को मिटा दें। सत्संग समाप्त हुआ। सब संगत अपने-अपने घर लौट गई, किन्तु सेठ जी वहीं बैठे रहे। सेठ जी के जन्म-जन्मान्तरों के कलुष जैसे एक पल में ही धुल गये। उसे अपने दिलरूपी दर्पण में जैसे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दिखाई देने लगे।
संगत के जाने के बाद उसने आपके सुकोमल चरणों में वन्दना कर अपने अपराधों की क्षमा मांगी तथा विनय की कि मैंने यहां के भक्तों से कहा था कि अभी मैंने अपनी कोठी का उद्घाटन नहीं करवाया। बिना उद्घाटन के कोठी तुम्हें कैसे दे दूँ। अब मैं अपना विचार प्रकट करता हूँ कि जिन महापुरुषों की वाणियों का पाठ करवाकर मैंने मुहूत्र्त करवाना था, वे महापुरुष (आप) साक्षात् हमारे घर में पधारे हैं अथवा जिन देवताओं का पूजन करना था उन देवताओं के देव ने आज स्वयं यहां कृपा फ़रमाई है। मेरे जैसा भाग्यशाली कौन होगा? आपके श्री दर्शन के लिए हज़ारों मीलों से प्रेमी आते हैं, उनको भी एकान्त में इतना समय आपके श्री दर्शन करने का शायद ही नसीब होता होगा जितना मुझे मिल रहा है। आपके श्री दर्शन तथा अमृत-वचनों ने मेरा कठोर ह्मदय मोम की तरह नर्म कर दिया है। मैं किस मुख से आपकी महिमा का वर्णन करूँ। आप साक्षात् भगवान हैं। हम जैसे जीवों को आप दिव्य दृष्टि देकर सत् और असत् की परख कराने आए हैं। मैं अपने मन की अवस्था को बदला हुआ देखकर स्वयं हैरान हूँ कि मेरे विचारों में धरती और आकाश का सा अन्तर इतनी शीघ्रता से कैसे आ गया ? आप दयालु हैं; आप अपनी कृपा-दृष्टि से जीव को भक्ति रूपी धन से मालामाल कर सकते हैं। जैसे गुरुवाणी का वचन है----
साचे   साहिबा   किआ   नाही   घरि   तेरै ।।
घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावहि ।।
यह बात आज प्रत्यक्ष मैंने देख ली। मेरी जिह्वा में यह शक्ति नहीं कि आपकी महिमा का गायन कर सकूँ। धन्य हैं गुरुदेव। उसने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी से नाम-दीक्षा ली और कृतकृत्य हो गया।
अब उसने अपने सम्बन्धियों से भी यह कह दिया कि मेरी कोठी का उद्घाटन बड़ी धूमधाम से हुआ है। उसने फिर उस कोठी का उद्घाटन कभी न करवाया। इतना प्रताप है एक पल की श्रेष्ठ संगति का। यदि जीव निरन्तर सन्त महापुरुषों की संगति करता रहे तो कितना लाभ होगा, इसका अनुमान कहां लगाया जा सकता है? जब आप नित्यप्रति पावन सत्संग की गंगा में सर्वसाधारण को मज्जन करवाकर चार-पांच दिन के पश्चात् श्री आनन्दपुर लौटने लगे तो सेठ जी ने एक-दो दिन और रहने का आग्रह किया। यह विनय भी की----दीनदयाल! हम जीवों के अवगुणों को न निहारते हुए इस भवन को अपना ही समझकर यहां पधारने की कृपा करते रहियेगा। यह मेरी हार्दिक अभिलाषा है। आप उस स्थान को कृतार्थ कर और आशिष से उसके दामन को भरकर श्री आनन्दपुर में पधारे।

No comments:

Post a Comment