इसमें श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी, श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी एवं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी
श्री पंचम पादशाही जी के समय-समय पर होने वाले श्री अमृत प्रवचन तथा अन्य
महात्माओं के भक्ति-ज्ञान-वैराग्य से युक्त विचारों को एकत्रित कर कथा, लेख, भजन, श्री अमर वाणी आदि विभिन्न रूपों में प्रकट किया जाता है, जिसे
पढ़ कर प्रेमियों को असीम लाभ हुआ और हो रहा है। इसे ज्योति-स्तम्भ कहा जाए
तो अनुपयुक्त न होगा। यह पूर्ण सन्त महापुरुषों के मिलाप का एक साधन है।
साधक के लिए पथ-प्रदर्शक है। इसी से जीवन के आनन्द रूपी संदेश को प्राप्त
कर सर्वसाधारण भी लाभान्वित हो रहे हैं।
श्री आनन्दपुर दरबार की संगतें व अन्य जीवों को भारत में तथा विदेशों में जहां-जहां भी भक्ति के जिज्ञासु थे और हैं, सबको यह आनन्दमय सन्देश पहुँचाता रहा और पहुँचा रहा है। इसने जीवन में नया रंग, नई उमंग, नया साहस, भक्ति की प्रतिभाशाली तरंग तरंगित करने का कार्य पूर्ण रूप से निभाया और निभा रहा है। इस मासिक पत्र "आनन्द सन्देश' के प्रकाशन के लिए श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री आनन्दपुर सत्संग आश्रम में "आनन्द पिं्रटिंग प्रेस' स्थापित करवा दिया। आनन्द सन्देश के साथ-साथ यहाँ धार्मिक पुस्तकें जैसे भक्ति सागर, भक्ति दीपक, सार-उपदेश, आनन्द रामायण तथा अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित की गर्इं।
इसके पश्चात् श्री श्री 108 श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी ने आत्मिक सम्पदा का एक विशेष अमूल्य उपहार "श्री परमहंस अद्वैत मत' (अमर ज्योति) ग्रन्थ---प्रेमी, गुरुमुखों एवं भक्ति की अभिलाषी आत्माओं को प्रदान किया, जिसमें
श्री आनन्दपुर के उन्नायक श्री परमहंस महान् विभूतियों का जीवन-चरित लिखा
हुआ है। इसे पढ़ने से ह्मदय दिव्य आलोक से आलोकित हो उठता है तथा परम सुख
एवं आनन्द की अनुभूति होती है। इसका प्रथम संस्करण अप्रैल सन् 1972 में प्रकाशित हुआ। परमार्थ, भक्ति
एवं आत्मोन्नति के उच्च सिद्धान्तों को सम्मुख रखकर प्रेमियों की मांग को
पूरा करने के लिए आप समयानुसार धार्मिक पुस्तकों का निरन्तर प्रकाशन करवा
रहे हैं।
मई सन् 1973 में विदेश में निवास करने वाले गुरुमुखों की मांग को पूर्ण करने के लिए ‘‘‘च्र्ण्ड्ढ च्द्रत्द्धत्द्यद्वठ्ठथ् एथ्त्द्मद्म’ के
नाम से अंग्रेज़ी भाषा में मासिक पत्रिका का प्रकाशन करवाया जिससे भारत तथा
विदेश में रहने वाले गुरुमुखों को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो रहा है। इसके
साथ-साथ अन्य इंग्लिश पुस्तकों का प्रकाशन भी हुआ है। अब इस आनन्द
पिं्रटिंग प्रेस में श्री आनन्दपुर दरबार की ओर से हिन्दी, सिन्धी तथा अंग्रेज़ी भाषा में धार्मिक पुस्तकों का प्रकाशन होता है, जिनको पढ़कर जनसाधारण भी लाभ उठा रहे हैं।
इसी प्रकार आप श्री आनन्दपुर के कार्य की देखरेख करते हुए अन्य स्थानों पर जनकल्याण हेतु जाते थे। एक बार 1953 में आप राजस्थान की ओर पधारे। छबड़ा गुगर, कोटा
से होते हुए अजमेर पहुँचे। वहां जयपुर की संगत ने विनय की कि श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी जयपुर को भी पवित्र करने की कृपा करें। उन लोगों की
नम्रता, श्रद्धा व प्रेम को देखकर कृपालु भगवान ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। आपने दो दिन पश्चात् जयपुर पधारने का उन्हें वचन दिया।
अब
जयपुर की संगत व महात्मा परम विवेकानन्द जी परस्पर सलाह करने लगे कि श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी के ठहरने के लिए एक ऐसा विशाल भवन होना चाहिये जहां
जयपुर की संगत आकर श्री दर्शन का लाभ उठा सके। उन्होंने अत्यधिक खोज की।
ढूँढ़ने पर पता चला कि एक सेठ ने एक नई कोठी बनवाई है, परन्तु
वह सेठ श्रद्धालु न था। जयपुर के एक भक्त सत्संगी की उससे जान-पहचान थी।
उसने सेठ जी के साथ चर्चा की कि हमारे श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दो-तीन
दिन के लिए जयपुर पधार रहे हैं। अगर आप अपनी नई कोठी उनके ठहरने के लिए दे
देवें तो बहुत अच्छा होगा। सेठ जी ने कहा कि अभी तो मैंने उसका उद्घाटन ही
नहीं करवाया। भक्तों ने कहा कि तीन-चार दिन बाद करवा लेना। उनके आग्रह पर
सेठ जी ने कोठी भक्त जनों को सौंप दी।
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