जब-जब भी आप कुछ दिनों के लिए जनकल्याण हेतु बाहर जाते तो श्री आनन्दपुर के प्रेमी, शरणागत
उन दिनों आपके वचनानुसार सेवा में तथा आपकी याद में एक-एक क्षण चकोर की
न्यार्इं बाट जोहने में लगाते। जब आप (श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री
तीसरी पादशाही जी) की कार सुरीले मनहरण हार्न करती हुई वापस आती तो श्री
आनन्दपुर की धरती का कण-कण और प्रेमियों के ह्मदय शरद्-पूर्णिमा के विधु को
पाकर कैरव कुसुम की तरह खिल उठते। कार के हार्न ज़मीन व आसमान को बाँसुरी
की धुन की न्यार्इं गुँजा देते। प्रेम दीवाने उस प्रेम की मधुरिमा को पाकर
पुन: मस्ती में झूम उठते। श्री आनन्दपुर तो मानो यह चाहता कि मेरा एक-एक कण
श्री चरण-कमलों से पवित्र हो ताकि मैं भी अपने सौभाग्य पर इठलाऊँ।
श्री
आनन्दपुर में शरणागतों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। जितनी
शरणागतों की संख्या बढ़ती उतना ही श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त
प्रसन्न होते, क्योंकि उनकी जन्मों से बिछुड़ी हुई रूहें अपने धाम में पहुँच रही थीं, जिनके
लिए वे सब रचनाएँ रच रहे थे। वे उच्च संस्कारी तथा आतुर प्रेमियों को
अर्थात् रूहों को जो आपके श्रीचरणों में शरणागत होना चाहती थीं या भक्ति की
अभिलाषी थीं, उन्हें निज स्थान पर
पहुँचा हुआ देख तथा अपने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी
के श्री वचनों को पूरा होता देखकर प्रसन्न हो रहे थे। अत्यधिक प्रसन्नता
आपको इसलिए हुई कि आप जिस कार्य को पूरा करना चाहते थे, वह सम्पूर्ण हो रहा था।
इस
प्रकार श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी ने यथासम्भव
साधनों से सर्वसाधारण को भी प्रेम-भक्ति का अमृत पिलाया। जिन जीवों के
ह्मदय में गुरु-भक्ति की लगन जागरूक हो चुकी थी तथा जो श्री दरबार में
शरणागति लेना चाहते थे, उनकी अटूट
निष्ठा को देखकर उन्हें चरण-शरण प्रदान की तथा जो संस्कारी आत्माएँ आपकी
विमल भक्ति में लगन बढ़ाती हुई संसार में रह रही थीं, आप उनके अन्तर्मानस की जानते हुए उन्हें उसी अनुरूप श्री प्रवचनामृत पान कराकर उनकी भक्ति बना रहे थे।
भक्त धर्मभानु जी जोकि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अनन्य प्रेमी व उच्च संस्कारी आत्मा थे, उनका
कथन है कि मैं दिल्ली में रहता था तथा सभा- समाजों में व्याख्यान दिया
करता था। ग्रीष्मावकाश होने पर मैं प्राय: श्री दर्शन के लिए श्री आनन्दपुर
आ जाया करता था। गर्मियों की छुट्टियां श्री दरबार की सेवा में ही व्यतीत
होती थीं।
जब
मैं यहां पहुँचा और श्री दर्शन की आज्ञा पाकर अन्दर श्री चरणों में
उपस्थित हुआ----तब श्री भगवान अकेले अपनी पवित्र मौज में पलंग पर विराजमान
थे। श्रद्धापूर्वक साष्टांग दण्डवत्-प्रणाम किया और ज्योंही आज्ञा पाकर
मैंने श्री पदारविन्दों में सिर रखकर आँखें उठार्इं तो सहसा श्री
सद्गुरुदेव जी ने फ़रमाया---""सत्संग होता है?'' मैं
असमञ्जस में पड़ गया कि क्या उत्तर दूँ। महाप्रभु जानते थे
कि मैं सभा-समाजों में बहुत व्याख्यान दिया करता हूँ, इसी विचार से ही श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने पूछ लिया कि ""सत्संग होता है।''
मैं तो यह प्रश्न सुनकर स्तब्ध सा हो गया। मुख से मेरे कोई उत्तर न निकल सका। इसपर श्री प्रवचन हुए कि ""सत्संग नहीं होता, क्योंकि किसी पुस्तक का पाठ कर देने को "सत्संग' नहीं कहते। पुस्तकों तथा ग्रन्थों की वाणी पढ़कर सुनाना, उसके अर्थ करना, परन्तु उसपर आचरण न करना---इसे "सत्संग' नहीं
कहते। तब महाप्रभु ने बड़ी ही गम्भीर मुद्रा धारण की और अत्यन्त
शान्तिपूर्वक समझाने लगे कि सत्संगउसद्वस्तु का संग कराना। सत् से मिलाप हो
जाना। सत् से मेल कौन कराता है? इन विविध पुस्तकों की पंक्तियों का पाठ करके इनपर चिन्तन करो, तब
पता चलता है कि ये धर्मग्रन्थ भी यही कहते हैं कि सत्-वस्तु से संग करना
चाहिये। सत् का ज्ञान महापुरुषों से होता है। अत: सन्त महापुरुषों से मिलाप
कर सत्-असत् का ज्ञान कराना ही सत्संग होता है। अत: अब सत्संग भी किया
करो।''
इन श्री प्रवचनों में कितना रहस्य छिपा है कि एक तो महापुरुष जीव को असत् से सत् देश की ओर ले जाते हैं, दूसरा आपने यह स्पष्ट करा दिया कि भक्त धर्मभानु जी केवल महाभारत, रामायण का पाठ ही सभा-समाजों में न किया करें, अपितु
इनका वास्तविक अर्थ समझाया करें जिससे अन्य जीव भी इन ग्रन्थों के रहस्य
को समझकर सन्त महापुरुषों की संगति प्राप्त करें तथा अपने मानव जीवन का
पूर्णतया लाभ उठा सकें।
इस प्रकार से आपने शरणागतों तथा अन्य प्रेमी जिज्ञासुओं को अपने अपने ढंग से ही लाभ पहुँचाया।
शरणागत
प्रेमी गुरुमुखों में से कुछ शरणागत साधु-वेष ग्रहण करने के लिए बार-बार
विनय करते। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कुछ अधिकारी गुरुमुखों को साधु-वेष
प्रदान करते। जब ये साधु-वेष लेकर श्री चरणों में पुष्प-पत्रादि भेंट करने
के लिए आते तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अत्यन्त हर्षित हो प्रसाद बंटवाते, उनकी खुशी का ठिकाना न रहता।
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