Monday, November 14, 2016

09.11.2016

श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने इस साधु श्रेणी में से कुछ को सत्संग-प्रचार के लिए भेज दिया ताकि ये नाम की अमर ज्योति शीघ्रातिशीघ्र भारत के कोने- कोने में फैलाएँ। प्रत्येक ग्राम तथा नगर में सत्संग आश्रम निर्माण करने का आदेश दिया और विशेषकर यह प्रवचन उसी दिन ही फ़रमाए----
""जब तक मनुष्य अपना जीवन उन नियमों के सांचे में नहीं ढाल लेता, जिन नियमों पर वह दूसरों को चलाना चाहता है, तब तक उसका प्रभाव पूर्ण रूप से दूसरों पर नहीं पड़ता। अपना आचरण ही दूसरों पर प्रभाव डालने के लिए उपदेश की अपेक्षा अत्यधिक प्रभावशाली होता है। अपने आचरण में कमी ही केवल वाचक ज्ञान बनकर रह जाती है, जिसका प्रभाव श्रोताओं पर पूर्णरूप से नहीं हो सकता। गुरुवाणी में भी कहा है----
अवर उपदेसै आपि न करै ।। आवत जावत जनमै मरै ।।
दूसरों को उपदेश देना या केवल दिखावा-मात्र काम करना, यह विचार केवल मान-बड़ाई और इज़्ज़त के लिए ही होता है कि लोग हमारी पूजा करें। जिन्होंने अमली तौर पर कुर्बानी की होती है, उनका प्रभाव लोगों पर स्वयं ही पड़ता है। इसीलिए पहले स्वयं आचरण करो, पुन: दूसरों को उपदेश दो तो उसका प्रभाव सबपर अधिक पड़ेगा, वरना आप आचरण न करने से दूसरों का कल्याण करने की अपेक्षा स्वयं ही आवागमन के चक्र में फंस जायेगा।
सेवक बनकर सद्गुरु की ओर से परमार्थ का सन्देश लोगों तक पहुँचाओ। उनकी तरफ़ से जो सेवा-भेंट हो उसे सद्गुरु की भेंट समझो। वह सब सेवा सद्गुरु के चरणों में भेंट करने की होती है ताकि अपनी ममता या अहंता किसी वस्तु में न हो। औरों को उपदेश देने का यह अभिमान नहीं करना कि मैं विद्वान् हूँ, मैं गुणवान् हूँ, मैं चतुर हूँ और मेरे ही उपदेश से मेरी मान्यता होती है। यह सरासर ग़लती और कमज़ोरी है।
जिसके ज़िम्मे सद्गुरु की ओर से जो सेवा लगी हो यदि वह स्वयं उसका मालिक बन बैठे तो उसकी यह हालत होती है कि----
।। दोहा ।।
सिष साखा बहुते किये, सतगुरु किया न मीत ।।
चाले थे सतलोक को, बीचहि अटका चीत ।।
                                     परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
तुम साधु हो। तुम लोगों में यह कमज़ोरी नहीं होनी चाहिये। यहां पर भी जिस महात्मा या भक्त को सत्संग-प्रचार की आज्ञा दी जावे, उसे दृढ़ता से समझ लेना चाहिये कि यह सेवा सद्गुरु की ओर से उसे सौंपी गई है। यदि सत्संग करनेवाला यह चाहे कि मेरी मान्यता हो, लोग मेरी प्रशंसा करें तो वह गिरावट की ओर जायेगा। स्वयं आचरण करता चला जाये, उसका प्रभाव स्वयं लोगों पर पड़ेगा।
श्री आनन्दपुर में भी जो महात्माजन सत्संग करते हैं, वे इसे अपनी सेवा ही समझें। इसी तरह हर सत्संगी चाहे वह श्री आनन्दपुर में है या बाहर सत्संग करता है, वह अपने आपको सेवक ही समझे। श्रोतागणों को चाहिये कि वे यह समझें कि हमें महापुरुषों के वचन सुनाये जा रहे हैं जिनपर हमने आचरण करना है।
ऐसा करने पर दोनों श्रोता और वक्ता श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की कृपा के पात्र बनकर अपने जीवन को सफल करेंगे।''
इस प्रकार से साधु मण्डली श्री अमृत प्रवचनों का रसपान कर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के अमर सन्देश को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सेवा में जुट गई। स्थान-स्थान पर जाकर आश्रम स्थापित किये। भारत में उत्तर से लेकर दक्षिण तक व पूर्व से पश्चिम तक इस अमृत को उड़ेला, यहां तक कि विदेश में भी इस कलिमलहारिणी त्रि-ताप विनाशिनी भक्ति का सन्देश पहुँचाया।

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