सन् 1953--1954--1955 के वर्ष में तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौजों ने श्री आनन्दपुर में अनूठा ही रंग भर दिया, जैसे
यह समय श्री आनन्दपुर को पावन तीर्थधाम बनाने तथा श्री आनन्दपुर दरबार के
कण-कण का साज सँवारने व जन-जन तक इस पुष्प की सुगन्धि फैलाने की लहरें साथ
लाया हो। अमर सत्यता की प्रतीक अनूठी एवं अनुपम रचनाओं का उद्घाटन श्री
आनन्दपुर में हुआ। प्रत्येक रचना एवं मौज में एक दिव्य जागृति तथा ज्योति
आलोकित हो उठी।
आनन्द सन्देश
सर्वांगीण दिव्य ज्योति से अनुप्राणित होकर श्री आनन्दपुर दरबार से प्रेम, भक्ति तथा आत्मज्ञान की जो किरणें फूटीं, वे प्रेमियों गुरुमुखों के ह्मदय में जगमगा उठीं। इस दिव्य ज्योति का प्रकाश घट-घट में पहुँचाने के लिए प्रेमियों, गुरुमुखों
तथा सत्संगियों ने श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! जो-जो भी श्री
सद्-प्रवचन आप जनकल्याण हेतु पर्व पर या समय-समय पर श्री मुख से फ़रमाते हैं, वे
अमर वचन ऐसी दिव्य ज्योति हैं जो दिल को छूकर मन के सभी शत्रुओं को दूर
भगाकर ह्मदय को शुद्ध कर देते हैं। इस ज्योति को घट-घट में जगाने के लिए
ऐसा उपाय किया जाये जिससे कोई भी प्राणी इस अमृत-रस के पीने से वंचित न रह
जाये। प्रेमियों और जिज्ञासुओं की प्यास तो इससे कहीं अधिक बढ़ी हुई है। वे
त्योहार पर कई संसारी झंझटों से श्री दर्शन पर नहीं आ सकते तो श्री
अमृत-प्रवचन सुनने के लिए लालायित रहते हैं। कुछ स्थान ऐसे भी हैं जहां छ:
मास अथवा एक वर्ष से पहले सत्संग उपदेश के लिए किसी प्रचारक महात्मा का
जाना नहीं हो सकता। ऐसा कोई साधन हो जिससे घर बैठे उन्हें श्री अमृत वचन
तथा अन्य भक्ति के मुक्ताकण मिल सकें।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस बढ़ती हुई मांग को स्वीकार किया। प्रेम, भक्ति, ज्ञान, वैराग्य
तथा त्याग के आचरण रूपी जीवन का निर्माण करने हेतु इन्हीं भावनाओं तथा
विचारों से युक्त एक मासिक-पत्रिका के प्रकाशन का प्रबन्ध करवाया, जिसके
पढ़ने तथा श्रवण करने से ह्मदय में ज्ञान का प्रकाश होने लगता है। यह
प्रकाश या रोशनी श्री दर्शन करने व श्री अमृत तुल्य वचनों को सुनने के लिए
उत्साह भर देती है। जब सन्त महापुरुषों की संगति मिल जाती है तो
काम-क्रोध-अहंकारादिक शत्रु इस रोशनी को पाकर स्वयं भाग जाते हैं।
इस मासिक-पत्रिका का शुभ नाम श्री मुख से "आनन्द सन्देश' फ़रमाया। 1 फ़रवरी 1953 को इस मासिक-पत्रिका के निकालने की आज्ञा प्रदान की। 13 अप्रैल 1953 वैशाखी के शुभ पर्व पर मासिक-पत्रिका "आनन्द सन्देश' प्रकाशित होने की खुशख़बरी सर्व संगत को सुनाई गई। सब संगत ने इस हर्ष में जयकारों से हाल को गुँजा दिया। आनन्द-सन्देश को उर्दू, हिन्दी व सिन्धी तीन भाषाओं में छपवाने का प्रबन्ध किया गया। इसका प्रथम संस्करण मई 1953
में छपकर तैयार हो गया और जन-जन को आत्म-ज्ञान की गंगा में स्नान कराने के
लिए वह घर-घर पहुँच गया। नाम अनुरूप गुणों को लेकर वर्तमान समय तक यह
उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होकर सर्वसाधारण को कृतार्थ कर रहा है।
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