श्री आनन्दपुर का कार्य विस्तृत होने के कारण आप "नया गांव' कोअधिक उन्नति न दे सके। इसीलिए आप द्वारा बनाई हुई रूपरेखा को श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी ने पूरा करने का प्रयत्न किया और आज भी महान् विभूति के रूप में श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी इस कार्य की पूर्ति कर रहे हैं।
पहले कहा जा चुका है कि समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) श्री सन्त नगर, नया गांव, रोशनपुर तथा अन्य स्थानों को कृतार्थ करते थे, परन्तु
मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर ही था। जब प्रत्येक स्थान पर कुछ दिन के लिए
सत्संग-नाम-उपदेश की पावन धारा बहाने जाते तो पुन: श्री आनन्दपुर ही लौट
आते। श्री सन्तनगर अथवा नया गांव या अन्य किसी स्थान को पवित्र करने के लिए
जाना होता तो विशेष पर्व श्री आनन्दपुर में ही मनाने के पश्चात् जाते।
केवल दशहरा पर्व ही नया गांव में मनाया जाता। यहां श्री सन्त नगर अथवा नया
गांव की लीला व श्री प्रवचनों को उस स्थान के आदि से अन्त तक एक ही बार
दिया गया है, क्योंकि प्रत्येक वर्ष में
दो बार सन्त नगर और दो बार नया गांव (उरुली कांचन) में विराजमान होते।
बार-बार लिखने के स्थान पर एक ही बार पूर्ण विवरण दिया गया है।
एक
बार श्री वचन हुए कि ""आप सब गुरुमुखों का नाता हमारे साथ
जन्म-जन्मान्तरों से चला आता है। आप सभी गुरुमुख त्रेता में भी थे और
द्वापर में भी। तभी तो उस पुरानी शक्ति को लेकर आप गुरु-सेवा के मग पर दृढ़
पग से चल रहे हो।'' दो-चार नये जिज्ञासु
भी मध्य में बैठे थे। उनके दिल में विचार आया कि काम तो सेवक स्वयं करते
हैं तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कैसे शक्ति प्रदान करते हैं। मन में
विचार उठा ही था कि श्री अन्तर्यामी भगवान ने सब सेवकों को (उनके सहित) जिस
स्थान का पहले वर्णन हो चुका है कि उरुली कांचन जहां अपना आश्रम स्थापित
किया था वहां से दस मील की दूरी पर "येवत' नामक स्थान ख़रीदा था; यह स्थान एक पहाड़ी के आकार का था, अपनी
मौज से इस पहाड़ी के पत्थर जहां तहां से उठाकर अपनी ज़मीन के चारों ओर
चारदीवारी बनाने का आदेश देकर भेज दिया। ये सब सेवक सुबह बस पर सवार होकर
वहां जाते। दिन भर सेवा करते और रात्रि को बस पर पुन: उरुली कांचन आ जाते।
यह उनका नित्यप्रति का नियम था।
इन सेवकों ने "येवत' पहुँचकर जब सेवा का कार्य आरम्भ किया तो पूरे दिन में 2-3
पत्थर ही दीवार तक लगा पाए। ये पत्थर इतने भारी और लम्बे- चौड़े थे कि
हिलने का नाम ही न लेते थे। गुरुमुखों को ऐसा काम करने का अभ्यास भी न था, परन्तु वे हिम्मत न हारते हुए श्री आज्ञानुसार सेवा में जुटे रहे। दूसरे दिन में गुरुमुखों ने 4-5 पत्थर जोड़े। इस प्रकार आठ-दस दिन के पश्चात् वे दिनभर में 10-12 पत्थर दीवार में जोड़ने लगे।
एक
दिन सायंकाल के समय श्री सद्गुरुदेव महाराज जी कार में विराजमान होकर येवत
पधारे और एक पत्थर पर विराजमान हो गए तथा श्री वचन किये---""क्या बात
है? काम बहुत ढीला है। क्या कारण है कि अभी तक बस ज़रा-सा काम हुआ है।'' सेवकों ने विनय की---""प्रभो! पत्थर बहुत भारी हैं। बड़ी कठिनाई से दिन भर में 10-12 पत्थर ही जोड़े जाते हैं।'' श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया----""वाह! ये पत्थर तो बेचारे कई जन्मों
से आस लगाए प्रतीक्षा कर रहे हैं कि कब गुरुमुखों के हाथ लगें और हमारा
कल्याण हो। ये तो आप ही आप जाते हैं। केवल संकेत करने की आवश्यकता है।'' जब
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इतने वचन फ़रमाए तो पड़े हुए वज़नदार पत्थर
गुरुमुखों के हाथ लगते ही तेज़ी से दीवार की ओर बढ़ने लगे। उन जिज्ञासुओं ने
यह अद्भुत लीला देखी कि जिन पत्थरों को सभी प्रेमी मिलकर बड़ी कठिनाई से
हिला पाते थे, वही पत्थर दो चार प्रेमी मिलकर आसानी से ले जाने लगे। फलस्वरूप दो घण्टे में 70 पत्थर दीवार में जोड़ दिए गये, फिर
भी थकावट का नाम न था। वे जिज्ञासु इस अलौकिक शक्ति को देखकर उस दिन से और
भी अधिक श्रद्धा व विश्वास से सेवा करने लगे। उन्होंने कुछ गुरुमुखों से
भी अपने मन की शंका का वर्णन किया तथा बताया कि शायद श्री सद्गुरुदेव जी ने
हमारे लिए ही यह लीला रची होगी। वास्तव में वे पत्थर यही बाट जोह रहे थे
कि कब प्रभु आएं और उन्हें श्री दर्शन देकर हिलने की सामथ्र्य प्रदान करें।
यह था उनके वचनों और कृपा-दृष्टि का प्रताप। उनकी अनुपम लीलाओं का कहां तक वर्णन किया जा सकता है! जितना करो उतना ही कम है।
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