सेवकों
ने श्री आज्ञा पाकर उस ओर कदम बढ़ाया, उस भूमि पर पहुँच गये जहाँ श्री मौज
थी। किन्तु वहां की ज़मीन इन्हें पसन्द न आई, क्योंकि वह तो पथरीली ज़मीन
थी। जहां दृष्टि डालो पत्थर ही पत्थर दिखाई देते थे। हरियाली के लिए नाम
मात्र को भी कोई पेड़ या पौधा नहीं था। उन्होंने थोड़ी से ज़मीन खोदकर देखी
तो नीचे सब पत्थर ही पत्थर थे। उन्होंने परस्पर परामर्श किया कि यह ज़मीन
तो बहुत ही पथरीली तथा ऊबड़-खाबड़ पत्थरों से भरी हुई है शायद हम भूल से
यहां आ पहुँचे हैं। उन्होंने इससे आगे कदम बढ़ाये, नदी के समीप उससे थोड़ी
अच्छी ज़मीन देखकर उसे खरीदने का विचार किया। श्री चरणों में लौटकर भूमि का
सब ब्योरा कह सुनाया।
श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी भविष्यद्-द्रष्टा, घट घट के ज्ञाता ही यह जानते थे
कि कहां क्या करना है। फ़रमाया कि चलो हम साथ चलकर देखते हैं। रास्ता
बैलगाड़ियों के जाने योग्य भी न था, फिर भी कार में विराजमान होकर अनेक
जम्प व कष्टों को सहते हुए उस भूमि पर आ पहुँचे, जिसे सेवकों ने बेकार और
पथरीली समझ कर उपयोगी न समझा था। आपने कार रुकवाली और फ़रमाया- "यही भूमि
हमारे काम की है। यही सत्संग का वास्तविक स्थान है। इसी को हमने महाराष्ट्र
का मुख्य केन्द्र बनाना है। इसके लिए ही तो हमने इतने स्थान खरीदे हैं।
यही वास्तविक स्थान है।" सभी सेवक चकित थे कि इसी स्थान को ही तो हमने बहुत
सख्त व बिगड़ा हुआ जानकर छोड़ दिया था। इन बड़े-बड़े पत्थरों पर मकान कैसे
बनेंगे। वे इसी सोच में ही थे कि श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि
"बिगड़े हुओं को सुधारना ही सन्त महापुरुषों का ध्येय है।" तुम सरकारी
कानून अनुसार इस भूमि को खरीद लो। आपने इस पथरीली भूमि के भाग्य स्वयं आकर
जगाये। इस धरती ने आपके इस अत्यन्त उपकार के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद दिया
तथा अपने भाग्यों पर इठलाने लगी कि अब तो श्री सद्गुरुदेव महाराज जी मुझे
कभी-कभी अवश्य श्री चरण-स्पर्श प्रदान कर कृतार्थ करते रहेंगे। सेवकों ने
आज्ञा प्राप्त कर 24 जून 1957 को इस स्थान को ख़रीद लिया, जिसका शुभ नाम उस
समय 'नया गांव' था जो कि वर्तमान समय में श्री प्रयागधाम के नाम से
विख्यात है। आप स्वयं उरुली कांचन लौट आये ।
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