Wednesday, October 5, 2016

श्री प्रयागधाम आश्रम..........

श्री प्रयागधाम आश्रम..........
उरुली कांचन (दयाल धाम) का स्थान संगतों के लिए छोटा था, क्योंकि आपके आगमन का समाचार शीघ्रातिशीघ्र महाराष्ट्र तथा आन्ध्र प्रदेश के सब श्रद्धालुओं तक फैल गया। प्रेमी जिज्ञासु अधिकाधिक संख्या में श्री दर्शनों के लिए आने लगे। आपकी मौज इस स्थान पर (नया गांव में) जल्दी विराजमान होने की थी। अतएव आप श्री आनन्दपुर से काफ़ी संख्या में सेवक साथ ले आते और सेवा कराते। इस बार भी जब श्री आनन्दपुर से उरुली कांचन पधारे तो 50--60 महात्मा व भक्त बस में साथ ले आये।
एक दिन आपने सब भक्तों व महात्माजनों को फ़रमाया---""चलो आज तुम्हें एक नई जगह पर ले चलें जहां किसी का आना जाना नहीं है, जो एक स्वतंत्र जगह है। आप सब लोग अपने-अपने सेवा के औज़ार लेकर हमारे साथ चलो। आज हम आपको उस स्थान पर ले चलेंगे जहां सत्संग का (महाराष्ट्र का) मुख्य केन्द्र बनाना है। वहां आज सेवा का प्रारम्भ कर आश्रम का उद्घाटन करना है।'' सब सेवक बड़ी उमंग के साथ सेवा के लिए तत्पर होकर हर्ष से कार के साथ-साथ चल दिये। मार्ग में गांव वाले उचक-उचक कर देखते कि इस निर्जन स्थान की ओर यह दल कहां से आ गया। जिन गांव वालों ने इस सड़क पर कभी साइकिल चलती न देखी, वे देख रहे थे कि कार बड़ी मस्ती से पत्थरों व ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पार करती हुई आगे बढ़ रही है। साथ में महात्मा व भक्तजन हैं।
कार के मार्ग में बड़े-बड़े पत्थर बार-बार मार्ग रोक लेते। महात्मा व भक्तजन मिलकर उन पत्थरों को उलट-पलट कर एक ओर कर देते तथा कार को मार्ग मिल जाता। ऐसा लगता था मानो ये पत्थर भी गुरुमुखों की तथा श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की बाट जोह रहे थे कि कब श्री सद्गुरुदेव महाराज जी हमें दर्शन दें और गुरुमुखों के हाथों हमारा भी उद्धार हो। गांव वाले यह देखकर चकित हो रहे थे कि कैसे भक्तजन पत्थरों को एक तरफ़ सरका कर मार्ग बनाते जा रहे हैं। इतने भारी पत्थर जिन्हें बिना किसी यन्त्र के हिलाना भी कठिन था, भक्तजन एक साथ मिलकर उन्हें उलट पलटकर एक ओर करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। इसी प्रकार सच्चे प्रेमी सेवक श्री इष्टदेव मालिक श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी के साथ "नया गांव' में एक पथरीली धरती पर पहुँचे।   
यहां पहुँचकर आपने कार को रुकवा लिया। यह धरती काले-काले पत्थरों से भरी हुई थी। आप कार से नीचे उतरे और कुर्सी पर विराजमान हो गये। आसपास सेवकों को बैठाकर श्री वचन फ़रमाये----""यह सामने एकत्रित पत्थरों के समूह के आकार की एक पहाड़ी है। इन पत्थरों को जो कि बीच में पड़े हुए हैं, पहाड़ी के मध्य में दीवार के आकार में जोड़ने हैं। ध्यान रहे कि कोई भी पत्थर नीचे न जाने पाये। नीचे किसी को नहीं गिराना। ऊपर चढ़ाने का प्रयत्न करना है।'' पुन: सेवकों को दो भागों में बाँटकर प्रसाद दिया और सेवा करने का आदेश दिया।
जब आसपास के लोगों ने यह सुना व देखा कि इन महात्मा लोगों ने  यह ज़मीन ख़रीदी है जो पथरीली है यानी बेकार है, जिस ज़मीन को हमारे दादा-परदादा ने भी कभी आँख उठाकर न देखा था, वही इन्होंने ली है, तो वे परस्पर कहने लगे कि महात्मा लोग इस ज़मीन को कैसे आबाद करेंगे। थोड़ा ज़ोर लगा लें आख़िर तो ये भी छोड़ ही जायेंगे। उनको यह विदित न था कि उसके निर्माता स्वयं यहां विराजमान हैं। उनका संकेत ही सब कुछ कर सकता है। सेवकों में जो शक्ति भरी है वह क्या-क्या कर दिखायेगी। उन्हें क्या मालूम कि यह सन्त जंगल में मंगल कर देनेवाले हैं। बस कुछ ही दिनों में वह पहाड़ी के आकार में पत्थरों से ढकी हुई धरती दीवार के रूप में समतल खड़ी हो गई। एक वर्ष में जबकि श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी केवल दो-तीन बार एक-एक मास के लिए यहां पधारते थे, यहां मकान बन गए, बावली खोदी गई, पत्थरों की चारदीवारी (सीमा) भी बन गई। अब वे गाँव के लोग जान गये कि यदि एक वर्ष में इतना कुछ हो गया तो इससे आगे न जाने क्या क्या हो जायेगा।

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