सन् 1958 की बात है कि श्री श्री 108 श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री तीसरी पादशाही जी) नया गाँव (श्री प्रयागधाम) में विराजमान थे, यहां
बावली की खुदाई का सेवा कार्य चल रहा था। सब प्रेमी दिलोजान से सेवा में
लगे हुए थे। समीप ही एक टपरा में जहां आजकल छतरीनुमा गोल कमरा बना हुआ है, श्री सद्गुरुदेव महाराज जी विराजमान थे। समय दोपहर का 1 बजे का था, गर्मी
का मौसम था। इसी समय कुछ विदेश में रहनेवाले प्रेमी-भक्त श्री दर्शनों के
लिए आये। श्री चरणों में उपस्थित हो श्रद्धा सहित दण्डवत्-प्रणाम किया।
श्री गुरुदेव ने आशीर्वाद देकर उन्हें अमृत तुल्य वचनों से कृतार्थ किया।
आपके
पावन दर्शन कर एवं अमृतमय प्रवचन सुनकर वे सब प्रेमी आनन्द-विभोर हो उठे
एवं अपने अपने देश को श्री चरणों से कृतार्थ करने के लिए करबद्ध हो विनय
करने लगे कि स्वामी जी! भारतवर्ष पर तो आपकी अत्यन्त कृपा है।
प्रान्त-प्रान्त और नगर-नगर में कृपाकर आप प्रेमी जिज्ञासुओं को श्री दर्शन
व अमृत प्रवचनों द्वारा सत्य पथ दर्शाकर नाम-भक्ति के सच्चे धन से निहाल
कर रहे हैं एवं जगह-जगह आत्मिक सुख व शान्ति प्राप्त करने के लिए सत्संग
केन्द्र बना दिये हैं। क्या हम पर भी कभी ऐसी कृपा होगी? विदेश में जहां चारों ओर माया ही माया का बोलबाला है, भक्ति-नाम, आत्मिक
सुख व शान्ति का नाम भी नहीं और हम जैसे जीव इस माया की झूठी चमक दमक को
देखकर भूल जाते हैं। क्या वहां भी कभी आपकी कृपादृष्टि होगी? हमारे भी कभी भाग्य खुलेंगे? क्या हमारे भी गृह आप अपने चरण-कमलों से पवित्र करेंगे? प्रभो!
इन देशों में भी कृपा कर अपने पावन दर्शन एवं अमृतमय प्रवचनों से इन
भूले-भटके जीवों को सद्मार्ग दर्शाकर सच्चा सुख व परम शान्ति प्रदान
कीजिये।
भक्तजनों
की भावपूर्ण प्रार्थना सुनकर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने उन्हें धैर्य
देते हुए फ़रमाया कि ""हम आपकी श्रद्धा-भावना से अति प्रसन्न हैं। घबराओ
नहीं। आप देख ही रहे हैं कि इस अवस्था में तो हम वहां जा नहीं सकते
(क्योंकि उस समय आपकी पवित्र सेहत बहुत ही सुकोमल थी) मगर हम वायदा करते
हैं कि समय आने पर स्वस्थ होकर हम आप सबके पास अवश्य आयेंगे। यह पारमार्थिक
कार्य तो धुर-दरगाह से हमारे ज़िम्मे है। हमने श्री आनन्दपुर की महिमा और
श्री परमहंस अद्वैत मत का सन्देश सृष्टि भर में जन-जन तक पहुँचाना है।'' आपकी
ऐसी भविष्यवाणी तथा ऐसे सुमधुर वचन सुन कर प्रेमी भक्तजन गद्गद हो अपने
भाग्य सराहने लगे एवं खुशी में सद्गुरु-महिमा का गुणानुवाद करने लगे।
आज
हम इन्हीं श्री वचनों को साकार रूप में देख रहे हैं। श्री पंचम रूप में
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी अथक परिश्रम करके श्री परमहंस अद्वैत मत का
अमर-सन्देश देश-विदेश के कोने-कोने में जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। जगह जगह
पर प्रेमी जिज्ञासु आत्माओं के लिए श्री परमहंस अद्वैत मत के सत्संग
केन्द्र बन गए हैं, जहां पहुँचकर अनगिनत जीव भक्ति, नाम और सत्संग से लाभान्वित होकर सच्चे सुख, शान्ति और आनन्द को प्राप्तकर जीवन सफल बना रहे हैं।
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