Saturday, October 22, 2016

16.10.2016




सन् 1963 में यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मौज के अनुसार अंगूरों के लिए गड्ढे खुदवाए। वे गड्ढे इतने पथरीले थे कि जिनसे यह आशा ही न की जा सकती थी कि पौधे यहां फल दे सकेंगे। बाहर खेतों से मिट्टी व खाद मंगवा कर इन गड्ढों में डलवाई गई। फिर अक्टूबर 1963 में ही एक दो पौधे निज कर-कमलों से लगा कर "अंगूर उद्यान' का उद्घाटन किया। इस अंगूर आरोपण के समय आपने गुरु-सेवा की विशेषता दर्शायी। कुछ विद्यार्थी भी उस समय सन् 1963 में श्री आनन्दपुर से "नया गांव' में श्री दर्शन की इच्छा से गये हुए थे। वहां पर आपकी मौज अंगूरों का कार्य करने की थी। वे विद्यार्थी सेवा की ओर कुछ कम ख़्याल देते थे। आपने फ़रमाया कि ""गुरु-सेवा जोकि अत्यन्त मौज में तरंगित हो, वे हीरे, लाल व जवाहरात हैं, जिन्हें किसी भी मूल्य पर नहीं ख़रीदा जा सकता। हाथ में आया हुआ समय खोकर पछताना पड़ता है। सेवा करने के लिए आए हो, सेवा करो। यह विद्या पुन: वापस जाकर पढ़ लेना। सन्त महापुरुषों की शरण में जाकर उस सच्ची विद्या को लगन से प्राप्त कर लेना ही उचित है। अतएव इस समय में सेवा रूपी हीरे जवाहर एकत्र कर लो।'' उस समय मिट्टी से ट्रक भरने की सेवा चल रही थी। बाकी सेवक 20 ट्रक मिट्टी प्रतिदिन भरा करते थे। उस दिन चार विद्यार्थियों के मिलने पर श्री आज्ञा हुई कि तीस ट्रक मिट्टी भर कर छुट्टी करनी है।
श्री आज्ञा पाते ही सभी सेवक प्राणपन से जुट गये। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी "नया गाँव' टपरा (जिसे आजकल छतरी कहते हैं) में विराजमान थे। प्रेमी पूर्ण उत्साह से सेवा कर रहे थे। दोपहर को श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रसाद देकर विश्राम गृह लौट गये। सेवक रात्रि के आठ बजे तक सेवा में जुटे रहे, परन्तु ट्रक अभी 23 ही भर पाए थे। सेवकों के दिल में यह विचार था कि तीस ट्रक पूरे करने ही हैं। श्री दर्शन खुलने का समय हो गया, परन्तु कोई भी अपने काम से तिल भर न हिला।
कुछ अन्य सेवा पर काम करनेवाले सेवक अपनी सेवा समाप्त कर श्री दर्शन के लिए तैयार होकर घर में बैठे थे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी भी "नया गांव' में मौजूद थे। उन्होंने पहले तो ट्रक भरने वाले प्रेमियों को कहा कि अब छुट्टी करो, श्री दर्शन का समय हो गया है। परन्तु सबने यही उत्तर दिया कि रात का चाहे एक बज जाये हम तो श्री वचन पूरे करके ही छुट्टी करेंगे। महात्मा सद्गुरु सेवानन्द जी सबके कमरों में गए (जो प्रेमी श्री दर्शन के लिए तैयार बैठे थे उन के पास) और कहा कि देखो! कैसी अमूल्य दात लुटाई जा रही है और आप आराम से घर में बैठे हो, चलो सेवा करो। सब अन्य प्रेमी भी वहां उपस्थित हो गये।
चाँदनी रात थी, चाँद भी इस सेवा में संलग्न हो गया कि कहीं अन्धकार हो जाने पर सेवा में बाधा न आए। एक ओर से ट्रक, दूसरी ओर से ट्राली, तीसरी ओर से डम्पर, इसप्रकार के हार्नों ने आकाश को एक नये जयघोषों से गुँजित कर दिया। ऐसा लगता था मानो गगनमंडल में सितारे तथा देवतागण भी इस सेवा में उपस्थित होकर लाभ उठा रहे हैं। ऐसी भीड़ हो गई कि एक मिट्टी की डलिया को हाथ लगाने को भी विनय करनी पड़ी। कुछ समय में सात ट्रक भी भर गए और सब काम पूरा हो गया। सभी जयकारों से नभ को गुँजाते हुए श्री दर्शन के लिए चल दिये।
कितनी विचित्र लीला है कि जिस प्रभु की मिलन की लगन में हज़ारों वर्ष की तपस्या भी फलीभूत होनी कठिन होती है, वही भक्तवत्सल कुल मालिक प्रेमियों की प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब प्रेमी आएँ और श्री दर्शन खुलें। प्रेमी, गुरुमुख श्री दर्शन  के लिए सीधा ही श्री दर्शनहॉल में पहँुचे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी भोजन लंगर से मंगवा कर प्रतीक्षा कर रहे थे। पहुँचते ही पहले नर लीला के रूप में फ़रमाया कि इतनी देर क्यों लगा दी। फिर सबको अपने सम्मुख खाना खिलाया। इसके बाद श्री दर्शन, सत्संग व प्रवचन हुए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया---""हिम्मते मर्दां, मददे ख़ुदा। जब इन्सान हौंसला बांधकर काम करता है तो कुदरत उसकी मदद करती है। फिर आप तो ठहरे गुरुमुख, आप यदि सेवा में पूर्ण रुचि से जुट जाओ तो दैवी शक्तियां स्वयं तुम्हारी मदद करने के लिए आएँगी।''
इस प्रकार श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने मिट्टी तथा खाद डलवाकर ज़मीन में अंगूर लगवाये। उन्होंने जो कुछ किया सब हम जीवों की ख़ातिर किया। आप उन विद्यार्थियों को फ़रमाया करते----(निज कर-कमलों में नाशपातियों के गुच्छे बनाकर उन्हें दिखाते) ""इस तरह अंगूरों के गुच्छे नीचे की ओर लटकेंगे। अब आप सेवा कर रहे हो फिर जब यहां आओगे तो तुम्हारी सेवा फल लायेगी। ये गुच्छे भी इसी तरह लटकेंगे। यहां इतने अंगूर होंगे कि संभाले भी न जा सकेंगे। फिर तुम खूब अंगूर खाओगे।'' अर्थात् श्री सद्गुरुदेव महाराज जी दर्शा रहे थे कि किए हुए कर्मों का फल मिलता है। यदि सेवा करोगे तो अच्छा फल मिलेगा।

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