यहां एक बार आपने निज मौज से
फ़रमाया----""यह एक छोटा श्री आनन्दपुर है। यह लगभग श्री आनन्दपुर की तरह ही
बनेगा। उदाहरणतया श्री मन्दिर, तालाब, पार्क, बाग़-बगीचे, सत्संग हाल, संगतों के निवास की जगह तथा स्नान के लिए टैंक व लंगर आदि यहां होंगे।'' बिजली व मोटरें भी आपने लगवार्इं जिससे कि बग़ीचोंे व खेतों की सिंचाई की जा सके। आपने उरुली कांचन के स्थान को छोड़कर "नया गांव' को
सत्संग का केन्द्र बनाया। यहां पर श्रीदर्शन के लिए संगतें आने लगीं। जब
प्रथम बार नया गाँव में संगतें आर्इं तो आपने श्री प्रवचन फ़रमाए----
""अनुकूल
भोजन के सेवन करने से ही शरीर स्वस्थ रह सकता है। भोजन सेहत के लिए खाया
जाता है। प्रतिकूल भोजन शरीर को हानि पहुँचाता है। कोई भी वस्तु जो शरीर के
अनुकूल नहीं, केवल जिह्वा के स्वाद के लिए खा ली गई हो, उससे हानि ही हानि है, लाभ कुछ नहीं होता।
इसी
तरह कर्म भी जो मनुष्य करता है मनुष्य को सोचना चाहिये कि अमुक कर्म जो
मैं कर रहा हूँ मेरे अनुकूल है या प्रतिकूल। यदि कर्म अनुकूल नहीं हैं तो
वे भी नुकसान पहुँचा सकते हैं। जैसे प्रतिकूल भोजन मनुष्य को हानि पहुँचा
सकता है, इसीतरह से प्रतिकूल कर्म भी
मनुष्य को हानि पहुँचाते हैं। यही कारण है कि यह जीव हर समय दुःखी और
अशान्त रहता है। बुरे कर्म करने से यह जीव चौरासी लाख योनियां खरीद बैठता
है। चौरासी लाख योनियां अपने किये कर्मों का फल है। अत: मनुष्य को पहले से
ही सोच समझकर कर्म करने चाहियें। ऐसे कर्म नहीं करने चाहियें जिनका परिणाम
दुःख, परेशानी, कलपना और अशान्ति है। फ़कीरों का कौल है----
।। शेअर ।।
अज़ मुकाफ़ाते---अमल ग़ाफ़िल मशौ ।
गन्दुम अज़ गन्दुम बिरौयद जौ ज़ि जौ ।।
सन्तों
का कथन है कि ऐ मनुष्य! कर्मों के परिणाम से गाफ़िल न हो। क्योंकि जैसे
गेहूँ बोने से गेहूँ की फसल मिलती है और जौ के बोने से जौ की फसल पैदा होती
है, इसी तरह से जिस प्रकार के कर्म भी किए जायेंगे, उसीके
अनुसार ही प्रकृति की ओर से फल मिलेगा। अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे
कर्मों का फल दुःखदायी होगा। इसलिए सन्त महापुरुष पहले से ही जीव को समझाते
व चेतावनी देते हैं कि ऐ मनुष्य! अब भी समय है कि तू सोच-समझकर कर्म कर
ताकि बाद में तुझे पश्चात्ताप न करना पड़े।
अब
प्रश्न यह है कि कौन-से कर्म अच्छे हैं जिनके करने से मन में शान्ति पैदा
होती है और कौन-से कर्म मनुष्य को दुःखदायी बनाते हैं जिनके करने से चौरासी
लाख योनियां भोगनी पड़ती हैं। सन्त महापुरुषों ने मनमति के अनुसार मोह-माया, अहन्ता, ईष्र्या, तृष्णा व वासनाओं के ख़्यालों के निमित्त किए गए कर्म बुरे कर्म कहे हैं। इनके करने से मनुष्य के मन में मानसिक रोग (आधि, व्याधि, उपाधि)
बढ़ जाते हैं और मनुष्य के विचारों में अशान्ति व क्लेश पैदा करते हैं।
कलह-कलपना बढ़ जाती है। मनुष्य हर समय चिन्ता की अग्नि में जलता रहता है।
इसलिए ऐसे कर्मों के न करने का सन्त महापुरुष उपदेश देते हैं।
सन्त सद्गुरु की सेवा, सद्गुरु-शब्द की कमाई, सत्संग, सबके
प्रति हित की भावना---ये अच्छे कर्म हैं। इन कर्मों के करने से मन में
शान्ति व आनन्द की प्राप्ति होती है। इसलिए ऐ जीव! तुम ऐसे कर्म करो जिससे
तुम्हारा यह जीवन सुख से व्यतीत हो और मृत्यु के बाद भी तुम्हारी रूह को
नरक योनियां न भोगनी पड़ें। परन्तु मनुष्य अपनी समझ से अच्छे कर्म करने का
मार्ग ढूँढ़ नहीं सकता। इसलिए समय के सन्त-सद्गुरु की संगति में ही इस जीव
को भक्ति व ज्ञान का मार्ग मिल सकता है जिसपर आचरण करने से ही मनुष्य सुख व
शान्ति प्राप्त कर सकता है।''
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