Tuesday, August 23, 2016

19.08.2016

इसके पश्चात आप सब सेवकों को साथ लेकर उस स्थान का निरीक्षण करने आये। आपने फ़रमाया- "अभी तो यह स्थान कुछ समय के लिए काम आयेगा, लेकिन जो वास्तविक स्थान हमें ज़रूरत है उसको अभी खोजना है।" महापुरुषों से क्या बात छिपी होती है। वे त्रिकालदर्शी होते हैं। अपने सेवकों की सेवा बनाने के लिए वे रचना रच देते हैं। वे सेवकों को सेवा का अवसर प्रदान कर लोक-उपकार का कार्य करते हैं। इससे सेवकों की गढ़त भी होती रहती है और साथ साथ उनके मन की अवस्थाओं की जाँच भी होती रहती है। इसे ख़रीदने का आज्ञा प्रदान की ताकि यहां परमार्थ-कार्य आरम्भ हो जाये।
      5 सितम्बर 1952 को उरुली कांचन (दयाल धाम) का यह स्थान ख़रीद लिया गया। यहां पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी समय-समय पर पधार कर सत्संग-उपदेश की पावन धारा बहाने लगे तथा साथ ही श्री दर्शन से जन-जन को कृतार्थ करने लगे। इसके साथ-साथ सेवा का कार्य भी आरम्भ करवा दिया। बड़े-बड़े कमरे निवास के लिए, भजनशाला, सत्संग हॉल, ब़गीचा व चारदिवारी बनवाई। वहां पर जो बावली खुदवाई, उसका पानी डॉक्टरों ने परीक्षण कर पूरे इलाके भर के पानी से प्रथम स्तर का बताया। आपने जहां भी श्री मौज अनुसार पानी निकलवाया, वहां ही स्वादिष्ट मधुर जल निकला। जहां भी श्री मौज के अनुसार आपने कार्य करवाये, वहां से यदि अमृत का स्त्रोत भी बह जाता तो असम्भव नहीं था। यहां पर बम्बई, पूना, कल्याण व हैदराबाद से संगते आकर श्री दर्शन, सेवा तथा सत्संग का लाभ उठाने लगीं।
इसके साथ-साथ आपकी उस वास्तविक स्थान की खोज के लिए भी मौज बनी हुई थी। उसका कार्य भी सेवकों से आरम्भ करवाया। आपने सेवकों को इस क्षेत्र के आसपास का स्थान ढूँढने की आज्ञा दी। उन्होंने उरुली से 10 मील की दूरी पर 'येवत' नामक शहर में कुछ ज़मीन खरीद कर वहां मकान, बावली और चारदिवारी पत्थरों की बनवाई। इसके बाद इसी उरुली स्थान से एक मील दूरी कच्ची सड़क पर कोरे गाँव (पूर्ण धाम) की कुछ ज़मीन खरीदी गई। इतनी ज़मीन खरीद लेने पर भी आपकी मौज जिस स्थान को पवित्र करने की थी वह पूरी न हुई। आपने फ़रमाया- वह स्थान ओर है जहां हमारा प्रयोजन सिद्ध होगा। हमने सत्संग का बड़ा आश्रम बनाना है। फिर सेवकों को स्पष्ट रूप से फ़रमाया- ''आप कोरे गांव (जो कि छोटा स्थान खरीदा है) से लगभग एक मील दूर, नदी से आध फ़र्लांग इस ओर ज़मीन देखो, वह उपयुक्त स्थान रहेगा।"

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