Tuesday, August 2, 2016

01.08.2016

आम लोग इस लाभ-हानि को नहीं समझ सकते। इसको समझने वाले बहुत कम लोग होते हैं। इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि परमार्थ और भक्ति को समझने वाले होते तो बहुत कम हैं, परन्तु उनकी कदर व कीमत सांसारिक लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है। जैसे लोहे की अपेक्षा सोना कम मिलता है, परन्तु कीमत सोने की अधिक है। जिन मनष्यों के शुभ संस्कार व क्रियमाण कर्म प्रबल होते हैं उनका नाम इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाता है। वे अपना भी सुधार कर लेते हैं और दूसरे भी उनके जीवन से लाभ उठाते हैं, जिनमें श्री पलटूदास जी, श्री चरनदास जी, श्री दादू दयाल जी, श्री रज्जब साहिब जी व सन्त सहजोबाई जी आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। इसी श्रेणी के और भी कई महात्मा और भक्त हुए हैं। इन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ रहस्य को समझकर स्वयं को उस पथ पर दृढ़ किया। अब उनके इतिहास से अनेकों जीव लाभ उठा रहे हैं। यह ठीक है कि उनकी संख्या कम है, परन्तु उनकी महानता बहुत अधिक होती है। उनके नाम व काम की सब सराहना करते हैं, क्योंकि उन लोगों ने भक्ति व परमार्थ के गूढ़ तत्त्व को समझा और उसपर आचरण किया।
      समय के पूर्ण सन्त सद्गुरु ही जीव को भक्ति व परमार्थ के सार तत्त्व को समझाते हैं और उसपर अमल करने का आदेश देते हैं। गुरुमुख पुरुष ही भक्ति के गूढ़ ज्ञान को समझते हैं और उसपर अमल करते हुए अपने मनुष्य जन्म को सफल बनाते हैं। जिनको ऐसा स्वर्ण अवसर मिल जाये, वे भाग्यशाली हैं। इस मार्ग पर चलते समय माया व मन से ज़बरदस्त सामना करना पड़ता है। काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि भी मन के साथी हैं। ये जीव को अपनी तरफ़ खींचते हैं। माया भी जीव को अपने झिलमिल रूप में फंसाती है, परन्तु गुरुमुख पुरुष माया के धोखे में नहीं आते ।
      ।। दोहा ।।
तीर तुपक से जो लड़ै, सो तो सूर न होय ।
माया तजि भक्ति करै, सूर कहावै सोय ।।
                              परमसन्त श्री कबीर साहिब जी
उन मनुष्यों का जीवन धन्य है जिन्होंने मन-माया को जीतकर परमार्थ और भक्ति के मार्ग पर दृढ़ता से आगे की ओर कदम बढ़ाया है। यही मनुष्य जन्म का लाभ है जिसे गुरुमुख ही प्राप्त कर सकते हैं। समय के पूर्ण सद्गुरु का संसार में अवतार धारण करने का अभिप्राय भी यही होता है कि यह जीव जो काम-क्रोध-मोह-लोभ-अहंकार, मन व माया की गुलामी में जकड़ा हुआ है, इनसे छुटकारा प्राप्त करे। इसका नाम ही वास्तव में मुक्ति है। इसका दूसरा नाम गुरुमुखता है और इसी का नाम ही परमार्थ व भक्ति है। अपनी सुरति को विषय-विकारों से स्वतन्त्र कराना ही सबसे बड़ा परमार्थ है। इसलिए सन्त-महापुरुष फ़रमाते हैं कि ऐ जीव! पहले अपना परमार्थ सिद्ध करो। स्वयं को काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार के बन्धन से स्वतन्त्र कराओ। अपनी सुरति को विषय-विकारों से छुड़ाओ। तृष्णा, ईर्ष्या ने जो तुम्हें घेर रखा है, इनसे अपना पीछा छुड़ाओ। यही सबसे बड़ा परमार्थ है। परमार्थ और भक्ति पथ पर चलने वाले जिज्ञासू को मन और माया की उलझनों से बचने के लिए सन्त सद्गुरु की सहायता की बहुत अवश्यकता है। सन्त सहजोबाई जी ने गुरु की आवश्यकता के विषय में कथन किया है-
।। दोहा ।।
बार बार नाते मिलै, लख चौरासी माहिं।
सहजो सतगुरु न मिलैं, पकड़ निकासैं बाहिं ।।
सहजो कारज जगत के, गुरु बिन पूरे नाहिं ।
हरि तो गुरु बिन क्यों मिलैं, समझ देख मन माहिं ।।
सांसारिक सम्बन्ध तो पुशु योनियों में भी मिल सकते हैं, किन्तु सद्गुरु की प्राप्ति मनुष्य-जन्म में ही हो सकती है, जो इस जीव को मोह-माया के बन्धन से स्वतन्त्र कराकर जीव की आत्मा को परमात्मा से मिलने का मार्ग बताते हैं। इसीका नाम ही भक्ति है और इसे ही परमार्थ कहते हैं।
      इस प्रकार आपने श्री अमृत प्रवचनों द्वारा जन-जन को लाभान्वित किया। आई हुई संगतें श्री अमृत प्रवचन सुनने के लिए सदा उत्सुक रहती थीं। आप भी उनकी आत्मि प्यास बुझाने के लिए समयानुसार श्री अमृत प्रवचन फ़रमाते ही रहते थे। एक बार पुनः आपने यहां कृपा की और पर्व के दिन ये प्रवचन फ़रमाए-

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