Saturday, August 13, 2016

11.08.2016

श्री सद्गुरुदेव महाराज जी सर्वदा कुछ दिन बाहर लगाकर अपने मुख्य केन्द्र श्री आनन्दपुर में ही कृपा फ़रमाते थे। इधर श्री आनन्दपुर में भी सेवा का कार्य बड़े ज़ोर से चल रहा था। आप कुछ दिन बाहर लगाकर पुनः प्रेमियों को कृतार्थ करने के लिए यहां पधारे। अब यहां पक्के मकान तैयार हो रहे थे। भूमि उपजाउ बनाई जा रही थी।
एक पटवारी ज़मीन का निरीक्षण करने आया। उसने सरकारी नियमानुसार यह लिखना था कि कितनी भूमि बंजर है और कितनी उपजाऊ है। उस समय जिस भूमि का कार्य आरम्भ था, दो-चार दिनों के पश्चात् उसने उपजाउ के योग्य बन जाना था। उसके विषय में पटवारी ने बंजर भूमि के नाम लिख दी। सेवकों ने भी श्री चरणों में विनय की कि प्रभो! पटवारी तो इसे बंजर के नाम लिख रहा है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने फ़रमाया कि उसे कहो कि इस ज़मीन को उपजाऊ लिखे। सेवकों ने पटवारी को बहुत समझाया कि दो-चार दिनों में यह उपजाऊ बन जायेगी, अतः यहां उपजाऊ शब्द लिखो। पटवारी ने उत्तर दिया कि यह ज़मीन तो पांच वर्ष में भी उपजाऊ बननी कठिन है। दो-चार दिनों का झूठ लिखा जा सकता है न कि इतना बड़ा झूठ! उसे क्या मालूम था कि यहां तो प्रकृति के स्वामी एक संकेत से जो कुछ करवाना चाहें करवा सकते हैं। उनके सामने यह साधारण सी बात है।
      पटवारी यहां से चल दिया। जब दफ़्तर में जाकर फाइलों में नोट करने लगा तो वही 'भूमि' उपजाऊ शब्द में लिखी गई। उसने फाईल बन्द की और घर की राह ली। पांच दिन पश्चात जब सने फाईल खोली तो अपनी कलम से 'उपजाऊ' शब्द लिखा पाया। वह हैरान था कि यह कैसे लिखा गया। पुनः वह श्री आनन्दपुर में उसी दिन आ गया। उस ज़मीन में बीज बोया देखकर उसके आशचर्य की सीमा न रही। उसने मन में समझ लिया कि यह महापुरुष मानवी शक्ति से परे हैं। उसने सेवकों के सम्मुख दर्शन करने की इच्छा प्रकट की। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने विनय स्वीकार कर उसे श्री दर्शन से कृतार्थ किया। उसने अपनी भूल पर श्री चरणों में क्षमा के लिए याचना की। आपने फ़रमाया कि यहां तो कुदरत की सभी शक्तियां स्वयं काम कर रहीं हैं। आप तो किसी न किसी साधन से पथ-भटकी रूहों को मार्ग पर लगाना चाहते थे। उस पटवारी को इस साधन से श्री दर्शन का अवसर मिला और उसने नाम उपदेश लेकर अपने जीवन का रुख़ सत्य-पथ की ओर मोड़ा।
श्री सद्गुरुदेव महाराज जी प्रत्येक दिन नये कार्यक्रम, नई रचना, नई उमंगों व प्रेमियों में नया साहस भरकर नई युक्ति से भक्ति का अमृत पिलाते। कभी प्रेमियों को सैर के लिए तासबावली ले जाते, वहां अनुपम लीलाएँ करते तथा साथ में सेवा कार्य भी करवाते तो कभी चक दयालपुर में ले जाते और कभी श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री दूसरी पादशाही जी के श्री वचन तथा मौज के अनुसार श्री आनन्दपुर में नव-निर्माण की रूप रेखाओं को साकार रूप देने के लिए सेवा की धुन लगाते। प्रेमी तो प्रेम की डोरी में खिंचे चले आते। उनके लिए तो आपकी मौज तथा श्री आज्ञा पर चलकर प्रसन्नता प्राप्त करना ही जीवन था। आपकी मौज श्री आनन्दपुर में जिज्ञासुओं तथा दर्शार्थ संगतों के लिए 'श्री आनन्द भवन शिमला' बनाने की हुई। इसके साथ-साथ पानी की कमी को पूरा करने के लिए बोरिंग तथा अन्य कार्यों को पूरा करने की योजना बनाई। इधर महाराष्ट्र की धरती आपके श्री मृदुल चरण-स्पर्श कराकर पुण्यवती बनने के लिए पुकार रही थी। जिस ओर से प्रेम की आतुर पुकार आपको बुलाती आप उधर ही प्रेम के आगार बनकर उस करुण गुहार को सुनते।

No comments:

Post a Comment