Saturday, August 6, 2016

05.08.2016

इधर 1947 में स्वतन्त्रता संग्राम के कारण देश-विभाजन हुआ। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ( श्री तृतीय पादशाही जी) ने तो इसके विषय में 1940 में ही कई बार श्री वचन फ़रमाए थे। उनमें से एक दो विशेष वचनों का उल्लेख पीछे किया जा चुका है। इन वचनों से आप सांकेतिक रूप से प्रेमियों को पहली ही चेतावनी दे चुके थे। सन् 1947 में जब देश विभाजन हुआ, उस समय कई लोग बे-घर हो गए। अशान्त वातावरण के उत्पन्न होने के कारण सबके हृदय करुण-क्रन्दन कर उठे। ऐसे समय में उनके अशान्त-त्रस्त हृदयों को किसी शान्तिदायक आश्रय की आवश्यकता थी। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने पहले से ही इस आनन्दमयी, सुखदायक श्री आनन्दपुर की नगरी को, आकुल-व्याकुल हृदयों को शान्ति, सुख आनन्द प्रदान करने के लिए रचा था। इसीलिए प्रेमी गुरुमुखों ने तो श्री सद्गुरुदेव जी का नाम स्मरण कर वहां से जान बचाई तथा इधर भारत में आते ही श्री चरणों में पहुँचकर शान्ति तथा आनन्द प्राप्त किया।
       आपने इस श्री आनन्दपुर की रचना के साथ-साथ वहां से 20 मील की दूरी पर अशोकनगर में यात्रियों के आने-जाने की सुविधा के लिए थोड़ी सी ज़मीन खरीद कर आश्रम स्थापित करवाया, जिसका प्रबन्ध श्री स्वामी बेअन्त आनन्द जी महाराज (श्री चौथी पादशाही जी) के हाथ सौंप दिया था। प्रचारक महात्माओं के सत्संग से हज़ारों की संख्या में अन्य जिज्ञासुओं ने भी इस भक्ति-मार्ग को सहर्ष स्वीकार किया और अपनी वेदना, व्यथा व अशान्ति-युक्त हृदयों को नामोपदेश से सिंचित कर सुख की सांस ली।
       इस घनघोर दुःखद समय में आपने उन जिज्ञासुओं को अशोकनगर तथा श्री आनन्दपुर में आश्रय देकर उनका दुःख निवारण किया। अब क्योंकि जिज्ञासुओं एवं प्रेमियों की संख्या बढ़ गई इसके लिए आपने श्री आनन्दपुर की रचना को विशाल रूप दिया। 1947 तक झोंपडों (टप्परों) तथा बावलियों से ज़रूरत की पूर्ति होती रही। अब आवश्यकताएं बढ़ गईं और उनकी पूर्ति के लिए यथासम्भव साधन किये जाने लगे। सेवा को विशाल रूप दिया गया।
यहां पर झोंपड़ों (टप्परों) के स्थान पर ईंटों के मकान बन गए। जहां –तहां खेतों में पड़े हुए पत्थरों को एकत्र करवाना आरम्भ कर दिया। स्थान-स्थान पर उद्यानों के लिए स्थान साफ़ करवाने आरम्भ करवा दिए। इस प्रकार गुरुमुखों को सेवा का सवर्णावसर मिला। आपने अमुल्य सेवा रूपी निधी गुरुमुखों को प्रदान की। अब इस उपकार पर यदि गहराई से दृष्टि डालें तो क्या हम उस स्तर तक बुद्धि को पहुँचा सकते हैं कि कितना कितना परोपकार किया श्रीसद्गुरुदेव महाराज जी ने हम पर? इधर हमारी दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपना अमुल्य समय देते हैं, इधर हमारी रूहानी प्यास को बुझाने के लिए तत्पर रहते हैं। क्या ऐसा कार्य किसी युग में हुआ कि स्वयं इष्टदेव कुल मालिक हमारे भोजन, निवास आदि विषयों पर स्वयं साकार रूप में ध्यान दें और साथ ही परलोक सुधारने का दायित्व भी अपने ऊपर लें? ऐसा अन्यन्त्र उदाहरण मिलना कठिन है

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