एक
दिन की बात है गर्मी तथा थकावट के कारण सब महात्मा व भक्तजन विश्राम के लिए
बैठ गए। नौकर काम पर लगे हुए थे। एक घनी कंटीली झाड़ी को छोड़कर वे आगे
बढ़ गए। आपने वहां कृपा करी। सभी सेवक उठ खड़े हुए। आपने जहां-तहां निहारा
कि कितना क्षेत्र साफ हो गया है। उस झाड़ी की तरफ संकेत कर आपने फ़रमाया
–“ यह झाड़ी क्यों छोड़ दी गई है?” सेवकों ने विनय की- प्रभो! नौकरों से यह
उखाड़ी नहीं जा रही थी, इसलिए उन्होंने छोड़ दी है। श्री वचन हुए कि जब तक
स्वयं कांटों में हाथ नहीं डालोगे, तो औरों से क्या सेवा करवाओगे!
श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी स्वयं सेवा के आदर्श थे। वे सेवकों को भी वही आदर्श
बनाना चाहते थे। श्रीवचनों को सुनते ही सबके सब ऐसे सेवा में जुट गए कि
किसी को भी न दोपहर की गर्मी, न दिनभर के विश्राम की सुधि रही। उन महात्मा
जनों का कथन है कि हमने उस दिन से कुर्ते पहनने छोड़ दिये, बुनियान व धोती
पहने सारा दिन श्रीसेवा में संलग्न रहते। हमें जो अपूर्व आनन्द उस समय मिला
शायद ही ज़िन्दगी में कभी मिला होगा।
श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी ने दर्शाया कि अपना आचरण ही उपदेशों से कहीं अधिक
प्रभावशाली होता है। परिणामस्वरूप कुछ दिनों में यह वन साफ़ हो गया और यहां
आश्रम की स्थापना की गई, जहां पर समयानुसार आप एकान्तवास के कृपा फ़रमाते।
कभी-कभी संगतों को भी श्री दर्शन का यहां सुअवसर दिया जाता। एक बार यहां
कुछ प्रेमियों के सम्मुख आपने श्री प्रवचन फ़रमाए-
“भक्ति और योग में कितना अन्तर है? भक्ति के सम्मुख ज्ञान-योग-साधन कुछ
नहीं, क्योंकि इन सबकी पहुँच केवल बुद्धि तक है। बुद्धि से आगे का मार्ग
वास्तविक प्रेम का मार्ग है जो सबसे ऊँचा है, क्योंकि बुद्धि से परे का
स्थान आत्मा है। वहां तक प्रेम की पहुँच है बुद्धि की नहीं। विज्ञान ने
जितनी भी वस्तुऐं बनाई हैं, सब बुद्धि की साहयता से बनाईं हैं। परन्तु इससे
आगे की मंज़िल तक विज्ञान द्वारा कोई नहीं पहुँच सका। गुरुमुख व प्रेमी की
सब कार्यवाही दिमाग़ व बुद्धि से परे की होती है अर्थात वास्तविक प्रेम
के मार्ग पर आरूढ़ होती है। वह सदा अपने इष्ट के प्रेम में मग्न रहता है।
प्रेम-भक्ति व निष्काम सेवा के बराबर कोई साधन नहीं। जब प्रेमी का लगाव
अपने इष्टदेव सद्गुरु के शब्द से जुड़ गया तो योग और वैराग्य में कौन सी
कमी रह गई। शब्द से सुरति जुड़ने का नाम ही योग है। संसार से उपरामता ही
वैराग्य है। सच्चा प्रेमी बिना किसी अन्य साधन के प्रेम द्वारा ही मंज़िल
तक पहुँच जाता है, क्योंकि प्रेमी का ध्यान अपने इष्टदेव की प्रसन्नता के
अतिरिक्त कहीं भी नहीं जाता। बस! श्री आज्ञा, प्रेम और सेवा ही गुरु-भक्ति
के सर्वोत्तम साधन हैं। यही सुगमता से मंज़िल तक पहुँचाते हैं। अतः प्रेमी
गुरुमुख अपने लक्ष्य की ओर ध्यान रखते हुए उस मंज़िल को प्राप्त करने के
प्रयत्न में लगे रहें, इसी में ही जीव का लाभ निहीत है।”
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