Wednesday, August 10, 2016

09.08.2016

इस प्रकार समय-समय पर श्री सद्गुरुदेव महाराज जी श्री वचनों द्वारा गुरुमुखों को चेतावनी देते रहते थे ताकि गुरुमुखों के विचारों में दृढ़ता बढ़ती जाए। सब गुरुमुखों-प्रेमियों को अपनी-अपनी सेवा पर लगाकर आप स्वयं सबकी देख-रेख करते और कुछ महात्माजन भी इसके लिए नियुक्त किए जोकि समयानुसार सब सुव्यवस्था और आवश्यकताओं की पूर्ति करते।
       एकबार आपकी मौज ऐसी उठी कि एक स्थान ऐसा भी होना चाहिए जहां पर कभी-कभी जाकर विश्राम किया जाए। महापुरुषों के लिए आराम कहां! वे तो केवल धरती, मानव तथा प्रकृति की प्रत्येक रचना में बनी हुई वस्तुओं की करुण पुकार सुनते हैं। घने बन, कंटीली झाड़ियां तथा एकान्त प्रकृति की गोद में खेलते हुए भूमि-खंड आपको श्री चरण-स्पर्श करने के लिए विवश करते थे, क्योंकि आपका कार्य कांटों में फूल खिलाना, प्रेम अमृत से सिंचित कर भाग्य जागान था। इसलिए आपने समयानुसार अपने परमार्थ की पूर्ति के लिए हर स्थान को पवित्र किया और जीवनपर्यन्त इसको करते रहे।
कुदरत के आंचल में, खड़ा हूँ मैं भी दामन पसारे।
सुन लो पुकार ऐ मांझी! बे-सहारों के सहारे ।।
हम भी ठूँठ काँटों के, बने जन्मों से प्रभु प्यारे ।
करो कृपा की इक दृष्टि , लगा दो हमको भी किनारे।।
       आप अपनी मौज के अनुसार मार्च 1950 ई. में मुरादाबाद और काशीपुर के मध्य में स्थित रोशनपुर में पधारे। यहां पर महात्मा परम योगानन्द जी, महात्मा सत विचारानन्द जी तथा भक्त दरयाई लाल जी को बुलवाया। रोशनपुर स्टेशन से दो मील की दूरी पर ग्राम लालपुर बहिराई में आप सेवकों सहित पधारे। यहां पर एक घना वन था जहां हाथ को हाथ न सूझता था, लेकिन महापुरुषों के भजनभ्यास के लिए एकान्त, शान्त, सुन्दर वातावरण था। एक स्थान पर यहां श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पलंग पर विराजमान हुए। उसी स्थान ने मानो श्री चरणों का स्पर्श पाकर श्री चरणों में स्वीकृत होने के लिए विनय की। दीनबन्धु श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने इस विनय को स्वीकार किया। उस स्थान को अपनी श्री मौज अनुसार उचित जानकर उसे खरीदने के लिए आज्ञा फ़रमाई और लौट आए।
       पुनः श्री व्यासपूजा के शुभ पर्व के पश्चात् अगस्त सन् 1950 में इस स्थान के भाग्य जगाने के लिए पधारे। श्री स्वामी जी श्री दर्शन पूर्ण आनन्द जी महाराज, महात्मा सत विचारानन्द जी, महात्मा सद्गुरु सेवा नन्द जी, महात्मा योग प्रकाशानन्द जी, महात्मा सन्तोषानन्द जी, महात्मा नित प्रेमानन्द जी, महात्मा दर्शन अलखानन्द जी, महात्मा भक्ति ध्यानानन्द जी, महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा शब्द विवेकानन्द जी, महात्मा पूर्ण श्रद्धानन्द जी, महात्मा अपारानन्द जी, भक्त पहलूमल जी (महात्मा परमात्मा नन्द जी), भक्त बलराम जी (महात्मा योग सत्यानन्द जी) तथा कुछ अन्य महात्मा व भक्त श्री आज्ञानुसार सेवा के लिए साथ गए। वहाँ पहुँच कर आपने घने वन को साफ़ करवाना आरम्भ कर दिया। ये सब श्री आज्ञा को शिरोधार्य कर सेवा में जुट गए। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी स्थान-स्थान से कांटों की सफ़ाई करवाकर यह दर्शा रहे थे कि इसी प्रकार भक्तिमार्ग में भी कांटे हैं। जो इन कांटों से नहीं डरता, वही भक्ति रूपी पुष्ट को प्राप्त कर लेता है। जैसे कांटों में उलझने पर पीड़ा अनुभव होती है, कभी रक्त भी बहने लगता है, इसीप्रकार भक्ति मार्ग में कष्टों से गुरुमुख को नहीं डरना चाहिए। इन कष्टों को सहन करके ही भक्ति की मंज़िल को प्राप्त किया जा सकता है। इस स्थान को साफ़ करने के लिए इन गुरुमुखों के साथ कुछ मज़दूर भी लगे हुए थे।

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