गुरुमुख
प्रेमीजन सेवा करते। आप सेवा के स्थान पर जाकर उनको श्री दर्शन से कृतार्थ
करते। आप श्री मुख से फ़रमाते थे कि प्रत्येक गुरुमुख को इन चार नियमों को
प्रतिदिन पूरा कर लेना चाहिये- 1. श्री दर्शन 2. सत्संग 3. भजन 4. सेवा।
आपने इन नियमों का परिपक्वता से परिपालन करवाया। सेवा में गुरुमुख प्रातः
से संध्या तक जुटे रहते। श्री दर्शन तो करुणाकर आप ही उन्हें सेवा पर
विराजमान होकर देते रहते। सत्संग का अर्थ ही यही है कि ‘सन्तों का संग’।
यहां तो संतो के सिरमौर श्री इष्टदेव कुल मालिक स्वयं विराजमान थे और उनकी
पवित्र संगति का सौभाग्य तो गुरुमुखों को मिल ही रहा था, फिर भी समय समय पर
श्री दर्शनों का विशेष लाभ मिल जाता। उसी समय पावन सत्संग भी होता तथा
कभी-कभी श्री मौज अनुसार स्वयं भी प्रवचन फ़रमाते थे। संध्या समय मूल मंत्र
का जाप आप स्वयं करवाते थे। इन चार नियमों को बिना किसी कठिनाई के गुरुमुख
पूरा कर लेते। शारीरिक निर्वाह की उन्हें चिन्ता ही क्या थी जबकि कुल
मालिक स्वयं उनके प्राणधन थे। समय पर लंगर (भोजन) तैयार हो जाता। भोजन सेवा
के स्थान पर पहुँचाने को सेवक तैयार होते, परन्तु गुरुमुखों को उस आनन्दमय
अमृत को पीकर भूख-प्यास की चिन्ता ही न रहती थी। स्वयं श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी निज कर-कमलों से श्री प्रसाद देते तो प्रेमीजन सेवा से थोड़ा
अवकाश कर लेते।
कुछ
जिज्ञासुओं ने श्री चरणों में सर्वस्व समर्पित कर शरणागत होने के लिए विनय
की। आपने फ़रमाया- “भक्ति के नियमों पर चलते हुए लंगर का दाल-फुलका तथा
साधारण पहरावा जिसे स्वीकार हो, उसके लिए यह सच्चा दरबार हमेशा खुला है जब
भी चाहें आ सकते हैं। यहां आवश्यकता पूर्ति तो की जाती है परन्तु मन की
इच्छाओं की पूर्ति नहीं की जाती।’’ उन प्रेमियों ने बार-बार विनय की कि
प्रभु! हमें आपकी प्रसन्नता के अतिरिक्त किसी इच्छा पूर्ति की चाह नहीं है।
यहां की दाल-रोटी बढ़िया पकवानों से कहीं उत्तम है, यहां की दाल की तुलना
में स्वर्ग के स्वादिष्ट भोजन भी तुच्छ हैं।
भक्ति के अभिलाषी प्रेमियों को तो एक दिव्य आनन्द की लहर में ग़ोते लगाने
की धुन सवार थी। इतनी श्रद्धा और ऐसे अटल विश्वास को देखकर श्री सद्गुरुदेव
महाराज जी ने शरणागति के लिए आज्ञा दी। 1947 के पश्चात जैसे जैसे दरबार की
महिमा फैलती गई, जो भी प्रेमी गुरुमुख अत्यन्त श्रद्घा-विश्वास सहित विनय
करता उसे श्री आज्ञानुसार शरणागति मिल जाती। इस प्रकार से काफ़ी संख्या में
गुरुमुख प्रेमियों ने शरणागति प्राप्त की तथा गुरु भक्ति के पथ पर चलकर
मानव-जन्म को कृतार्थ करने लगे।
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