Tuesday, August 9, 2016

08.08.2016

इसप्रकार सन् 1947 के पश्चात् दिन प्रतिदिन शरणागतों की संख्या बढ़ती गई और आप सेवा का भण्डार बढ़ाते गये। आए हुए शरणागतों को आप समय-समय पर पावन प्रवचनों से कृतार्थ करते थे। आपने एक बार श्री वचन फ़रमाये-
“ मनुष्य को संसार में बड़े विचार से रहकर अपने कर्तव्य को हर तरह से ख़्याल में रखते हुए अपने जीवन का सफ़र तय करना है। समय अपना काम करता है, वह किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। अब इसी समय के अन्दर जिसने कुछ कर लिया,वह उतना ही लाभ प्राप्त करेगा। जिसने इस लक्ष्य को समझकर कुछ काम संवार लिया तो अच्छा है, नहीं तो गफलत और मन के धोखे में रहकर वह हानि उठायेगा। वास्तव में तो उसे लाभ प्राप्त करना था, परन्तु मन व माया के धोखे में आकर लाभ की अपेक्षा हानि प्राप्त की- मन व माया की लपेट में आकर वह चौरासी लाख यौनियों के चक्र में पड़ गया। जैसे रोशनी व अन्धेरा दो पहलू हैं, इसी तरह कुदरत की रचना में प्रत्येक वस्तु के दो पहलू हैं। सुख-दुःख, दिन-रात, सत्य-असत्य, बुरा-भला, आत्मा-शरीर, माया व भक्ति – सब के दो दो पहलू हैं।
       गुरुमुख पुरुष माया में बर्तते हुए भी भक्ति को ग्रहण करते हैं। जैसे व्यवहार में माया की प्राप्ति के लिए बहुत से कष्ट, बाधाएँ और परीक्षाऐं सामने आती हैं, इसीतरह परमार्थ व भक्ति के रास्ते में कईं बाधाओं का सामना करना पड़ता है। गुरुमुख इसी राह पर चलते हुए अपने आपको मन व माया के चक्कर से बचाकर भक्ति में सफलता प्राप्त करता है। जब जीव माया के पंजे में फँस जाता है तो उसे आनन्द का धाम भूल जाता है। लेकिन गुरुमुख पुरुष अपने सद्गुरु की शरण लेकर स्वयं को माया की लपेट से मुक्त कर लेता है जबकि मायावी जीव काम-क्रोधाति दुश्मनों के पंजे में आकर दुःखी रहते हैं।
       यदि गफ़लत में समय बीते और रूह को मुक्त न कर सके तो कितनी हानि है। केवल यह नहीं कि ज़िन्दगी के दिन पूरे करने हैं और खाना-पीना, पहनना और समय गफ़लत में गँवा देना है। जिसने मालिक की प्रसन्नता प्राप्त नहीं की उसने माया के चक्र में समय व्यर्थ गँवा दिया और कुछ लाभ प्राप्त न किया। कुदरत की तरफ से ऐसा अच्छा संयोग मिलने पर भी यदि ग़फलत के कारण माया का दबाव पड़ गया- माया ने ताकत पकड़ ली तो परिणाम ख़राब होगा। डालना तो माया पर दबाव है-यदि माया ने दबाव डाल दिया तो अत्यधिक हानि उठानी पड़ेगी।
       सत्पुरुष तो यही चाहते हैं कि वह कौन सा सौभाग्यशाली समय होगा जब जीव इस माया के घेरे से आज़ाद होगा। आया तो था माया से स्वतंत्र होने के लिए तथा मालिक की भक्ति के लिए, परन्तु बन गया माया का गुलाम। मालिक के दरबार में ऐसा नियम नहीं है कि किए हुए कर्मों का फल न मिले। कोई इन किये हुए कर्मों के फल से ग़ाफिल न रहे। वह तो कुदरत अवश्य देगी। सन्त महापुरुष इसी बात पर ज़ोर देते हैं चाहे कोई माने या न माने। माया एक तिलकन बाज़ी है। एक बार पांव फिसला तो बहुत गहरे गड्ढे में जा गिरेगा जिससे निकलना बहुत कठिन है। इस रास्ते में माया से पीछा छुड़ाना है। माया को पीठ देकर भक्ति प्राप्त करने का प्रयत्न करना है। इन सब पर नज़र रखते हुए सद्गुरु के वचनों पर आचरण कर जीवन का कल्याण करना है।
उदाहरणतया एक यात्री जब जंगल में चोरों-डाकुओं से घिर जाता है तो उस समय उसे परिवार, धन-दौलत कुछ भी याद नहीं आता, केवल वह अपनी जान बचाता है। इसी प्रकार सुरति मोह-लोभ-अहंकार आदि शत्रुओं से घिरी हुई है। यह सुरति शरीर, मन, इन्द्रियों के बन्धन में करोड़ों गुना अधिक आई हुई है, लेकिन जीव को पता नहीं चलता। इसे सद्गुरु के शब्द की कमाई के द्वारा आज़ाद करना है। सन्त महापुरुष जो कि त्रिकालदर्शी, परम चेतन शक्ति हैं, वे ही सब कुछ जानते हैं। जीव इस जन्म में आज़ाद हो गया तो अच्छा, नहीं तो बहुत भारी बन्धन में पड़ जायेगा जिससे निकला मुश्किल होगा।
       यह कोई रेलगाड़ी की यात्रा नहीं है  कि एक रेल से निकल जाने पर दूसरी गाड़ी पकड़ लेंगे और सफ़र तय हो जायेगा। रूहानी मार्ग में तो जन्म-जन्म का अन्तर पड़ जायेगा। यह एक ऐसा नाज़ुक रास्ता है जिसे केवल सन्त महापुरुष ही जानते हैं कि जीव काल और माया के चक्र से कैसे छुटकारा पा सकता है।
       यदि सद्गुरु की आज्ञा, मौज व वचनों पर विश्वास करके अमल करोगे, तो सब बन्धनों से आज़ाद हो जाओगे। सन्त महापुरुष जो कुछ भी करते हैं, जीव की भलाई के लिए करते हैं। वे केवल जीवों के कल्याण की ख़ातिर ही ऐसी रचना रच देते हैं ताकि प्रेमी-गुरुमुख सद्गुरु दरबार की सेवा आज्ञा व श्री मौज अनुसार करके भक्ति के हीरे-जवाहरात प्राप्त कर मालामाल हो सकें। गुरुमुखों का कर्तव्य है कि श्री वचनों पर आचरण करते हुए जीवन का कल्याण करें।’

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