Wednesday, August 17, 2016

13.08.2016

नया गांव (श्री प्रयागधाम)
परमार्थ-लाभ कराने हेतु आपको मानव-हृदय आर्त्त स्वर से पुकार रहे थे। प्रेमियों की विह्वल पुकार ने श्री सद्गुरुदेव महाराज जी को विवशतापूर्वक खींचा। आप जहां भी कृपा फ़रमाते, वह धरती तथा मिट्टी पवित्र बन जाती। मानव, दानव-वृत्तियों को त्यागकर देव-वृत्तियों को धारण कर लेते। माया व मन अपना सा मुँह लेकर रह जाते। उस धरती के कण-कण में हर्ष समा जाता। आपको बम्बई, पूना, शोलापुर, कोल्हापुर, कल्याण, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) के प्रेमी विनय कर रहे थे। वे इतनी दूर श्री आनन्दपुर में सुगमता से श्री दर्शन न कर सकते थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी की मौज भी यही थी कि भारत के कोने-कोने में इस नाम की ज्योति की किरणें पहुँचे अतएव भक्तों के आग्रह करने पर आपकी मौज यह हुई कि महाराष्ट्र में भी कोई आश्रम बनाना चाहिए जहां आकर संगतें श्री दर्शन व सत्संग का लाभ उठा सकें।
      आपने अपनी हार्दिक उमंग तथा दिव्य-दृष्टि से ज़िला पूना को सत्संग के लिए उचित क्षेत्र चुना और श्री मौज उठी कि इसके आस-पास की भूमि खरीदी जाए। यहीं पर ही आश्रम बनाया जाए, क्योंकि यहां का जलवायु स्वास्थयप्रद है। आपने अपने सेवकों महात्मा अनमोल धर्मानन्द जी, महात्मा दर्शन प्रेमानन्द जी व महात्मा सद्गुरुसेवा नन्द जी को आज्ञा दी कि शोलापुर रोड़ पर किसी अच्छे स्थान को ढूँढ़ो। आपस में परामर्श करो फिर हम वहां जायेंगे। स्वयं श्री सद्गुरुदेव महाराज जी पूना शहर में किसी स्थान पर विराजमान थे। सेवकजन श्री आज्ञा मानकर शोलापुर रोड़ की तरफ गए। रास्ते में ज़मीनें देखने लगे, क्योंकि बहुत दूर तो जाना नहीं था। पूना से 18 मील की दूरी पर उरुली कांचन बसा हुआ है, इसलिए वहीं ज़मीन देखने लगे। वहां पर इन सेवकों को एक भक्त सख़ावतमल मिल गया जो उपदेशी भी था और वहां के लोगों से परिचित भी। भक्त सखावत मल की सहायता से उरुली शहर से एक मील की दूरी पर पूना की ओर सड़क के समीप इन्हें एक भूमि जँच गई, वहां चार-पांच कमरे भी बने हुए थे। उस भूमि के मालिक से मिलकर ज़मीन के विषय में सब कार्यवाही कर श्री चरणों में पहुँचकर सब वृतान्त निवेदित किया।

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