Wednesday, August 3, 2016

02.08.2016

''प्रत्येक मनुष्य में कोई  न कोई लगन रहती है। प्रत्येक प्राणी की यह इच्छा होती है कि मैं सबसे बड़ा बनूँ, मुझे सबसे बड़ा दर्जा मिले, मेरी सबसे अधिक इज़्जत हो और मैं सुखी रहूँ। लगभग इस किस्म की इच्छाएँ हर मनुष्य में हुआ करती हैं।
      अब सोचना यह है कि सबसे ऊँचा व बड़ा पद कौन सा है! सबसे उत्तम व श्रेष्ठ वस्तु कौनसी है जिसके मिलने से यह जीव सुख का अनुभव कर सकता है, क्योंकि प्रत्येक जीव अपने इस निशाने को ध्यान में रखता है और दृढ़-संकल्प से उस चीज़ को प्राप्त भी कर लेता है। यदि मनुष्य की इच्छा हो कि मैं धनवान बनूँ, विद्या ग्रहण करूँ, डॉक्टर बनूँ या कोई और गुण ग्रहण करूँ, परन्तु यदि इच्छा के साथ दृढ़-संकल्प नहीं है तो सफलता प्राप्त नहीं हो सकती अर्थात् विचारों में दृढ़ता होने से ही सफलता प्राप्त हो सकती है।
      सिकन्दर बादशाह का संकल्प समस्त विश्व को विजय करने का था। अब विचार किया जाये कि सिकन्दर  में और आम मनुष्यों के शरीर में देखने में कोई अन्तर नहीं था। अन्तर था तो केवल विचारों का, दृढ़-संकल्प का। अपने विचारों की प्रबलता से और दृढ़-संकल्प से ही वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सका था।
      अब प्रश्न यह है कि कौन-से काम की सफलता में सुख है और कौन-से काम की सफलता में दुःख, चिन्ता और कल्पना है? कौन-से काम मनुष्य को शान्ति पहुँचा सकते हैं और कौन-से काम जीव को दुःखदायी बना सकते हैं?कौन-से काम के लिए दृढ़-संकल्प करके मनुष्य को उसे प्राप्त करना चाहिए? यदि एक चोर चोरी करता है तो दृढ़ संकल्प से ही अपने काम में सफलता प्राप्त करता है। यदि दूसरे आदमी ने ईश्वर-प्राप्ति की कोशिश की तो वह अपने दढ़ संकल्प से अपने मनोरथ में सफल हो गया। अब सोचना इस बात को है कि अपने दढ़ संकल्प से, अपनी विचार शक्ति से किस काम को किया जाये जिससे मनुष्य को सुख का अनुभव हो। क्योंकि मालिक की प्राप्ति और चोरी दोनों कामों में सफलता तो दृढ़ संकल्प से मिल गई, परन्तु परिणाम दोनों का भिन्न-भिन्न है। भक्त और चोर में कितना अन्तर है? भक्त का नाम तो सब पसन्त करते हैं, परन्तु कोई भी अपने को चोर कहलवाना पसन्द नहीं करता। जितना अन्तर अर्जुन व दुर्योधन में है, उतना ही मालिक की प्राप्ति और सांसारिक वस्तुओं में है। मालिक की प्राप्ति से मनुष्य जन्म-मरण से छुटकारा पा सकता है और माया के पदार्थों एवं सांसारिक इच्छाओं से दुःख कलपना और अशान्ति खरीद सकता है। परिणाम दोनों का अलग-अलग है। यह तो कोई नहीं चाहता कि मैं दुःखी रहूँ। सब कोई सुखी होना चाहता है, मगर सुख है मालिक के नाम में, मालिक की भक्ति में, इस सुख के लिए ही दृढ़-संकल्प होना चाहिए।
।। दोहा ।।
धनवन्ते सब ही दुखी, निर्धन हैं दुख रूप ।
साध सुखी सहजो कहै, पायौ भेद अनूप ।।
(सन्त सहजो बाई जी)
महाभारत के युद्ध से पहले भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी से अर्जुन ने भगवान को मांगा और दुर्योधन ने भगवान से युद्ध का सामान मांगा, परन्तु महाभारत के युद्ध में विजय अर्जुन की हुई। मांगने को अर्जुन भी युद्ध का सामान मांग सकता था, परन्तु जिसको भगवान की प्राप्ति हो जाए उसे किस बात की कमी रहेगी। भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी ने युद्ध में समय-समय पर अर्जुन की रक्षा की। इसी प्रकार से मनुष्य को भी चाहिये कि वह अपने दृढ़-संकल्प को ईश्वर प्राप्ति में लगाए, तभी वह सुखरूप बन सकता है। इसलिए अपने दृढ़-संकल्प को मालिक के भजन-ध्यान की ओर लगाकर मनुष्य जन्म के ध्येय को प्राप्त करो।

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