जिस
स्थान पर सन्त-महापुरुष चरण-स्पर्श करते हैं, वहां की रज भी पूजनीय बन
जाती है। जहां स्वयं मालिक अपनी मौज के अनुसार पावन लीलाएं करते हैं, वे
स्थान स्मारक (यादगार) के रूप में सदा उनकी याद बनाए रखने के लिए प्रतीक
(चिन्ह) होते हैं। यहां पर श्री दर्शन खुलने वाले कमरे के पीछे की ओर
दो-तीन टाहलियों के (शीशम के) वृक्ष थे। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी (श्री
तीसरी पादशाही जी) कई बार श्री मुख से फ़रमाते थे कि जिनका सम्पर्क जिस रूप
में है, सबका सद्गुरु से नाता जन्म-जन्मों से चला आता है। हम सबको पहचानते
हैं, परन्तु हमें कोई नहीं पहचान सकता। इस प्रकार इन दो-तीन टाहली वृक्षों
में से एक टाहली वृक्ष के नीचे सांय समय जाप करवाते तथा दोपहर समय श्री
दर्शन का सौभाग्य देकर व अनुपम लीलाएँ कर दिलों को बरबस खींचते थे। प्रेमी,
गुरुमुखों को श्री दर्शन करके जन्म-जन्मान्तरों के मलिन मन को धोने का
सुअवसर मिल जाता और आप सेवा में होने वाली शारीरिक थकावट को अपनी अनुपम
लीला दिखाकर दूर कर देते। इस प्रकार सन् 1946 से 1963 तक आप (श्री
सद्गुरुदेव महाराज जी श्री तीसरी पादशाही जी) समय-समय पर श्री सन्त नगर में
कृपा करते रहे तथा इस टाहली के नीचे अनेकों बार श्री मुख से प्रवचन
फ़रमाए, जिन में से केवल दो तीन सत्संग उपदेश ही यहां दिए जा रहे हैं।
एक बार जबकि श्री सन्तनगर ख़रीदा ही था उसके कुछ समय उपरान्त यहां पर
संगतें श्री दर्शन के लिए आईं। आपने प्रथम बार टाहली के नीचे विराजमान होकर
श्री वचन फ़रमाए-
"भक्ति और परमार्थ एक ऐसी वस्तु है जिसको सर्वसाधारण लोग नहीं समझ सकते।
भक्ति और परमार्थ सार वस्तु है। इस सार वस्तु की परख बहुत कम मनुष्यों को
है। संसार में सब लोग माया के पदार्थों, इन्द्रियों के सुखों में फँसे हुए
हैं। इसलिए सुरति पर माया के पर्दे चढ़े हुए हैं और यह जीव बिल्कुल माया का
रूप बन गया है। स्त्री से सम्बन्ध, बच्चों का मोह, धन एकत्र करने का विचार
इस तरफ़ तो सब खुशी व रुचि से काम करते हैं और वे यह समझते हैं कि हम ठीक
मार्ग पर चल रहे हैं। परन्तु वे परमार्थ की दृष्टि से वास्तविकता से दूर
पड़े होते हैं। क्या परिवार के साथ सम्बन्ध व धन एकत्र करने का नाम परमार्थ
है? परमार्थ की समझ व परख अथवा सार वस्तु की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य को
नहीं होती और न ही प्रत्येक मनुष्य भक्ति और परमार्थ के वास्तविक रहस्य को
समझ सकता है। एक मनुष्य संसार में बहुत बुद्धिमान है, यदि उसकी सुरति धन,
स्त्री-पुत्र व मान-बडाई की तरफ़ लगी हुई है तो वह परमार्थ के अभिप्राय को
समझने से बिल्कुल कोरा है। मृत्यु के पश्चात ऐसे बुद्धिमान द्वारा एकत्र की
हुई ये वस्तुएँ क्या उसकी सहायता कर सकती हैं या आजतक इन चीज़ों ने किसी
की सहायता की है? यदि नहीं तो इनपर किसी प्रकार की आशा रखना भारी भूल है।
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