इस
प्रकार 1946 से 1963 तक आपने कितनी बार ही यहां पर इस टाहली के समीप प्रवचन
फ़रमाए, कितना यहां पर प्रेम लुटाया, इसका अनुमान लगाना कठिन है। जड़-चेतन
सभी को आपने अतुल्य प्रेम प्रदान किया। आपमें यही विलक्षणता थी कि आपके
समक्ष आते ही श्री दर्शन की माधुरी छटा से प्रेमी आत्म विभोर हो जाता। आपके
श्री दर्शन में क्या जादू था कि-
प्रेम-मंत्र जड़ चेतन सब में, करुणामय ने भर डाला।
जो हुआ आपकी शरणागत, उसे मालामाल था कर डाला ।।
जिस ओर निहारा एक नज़र, वहां प्रेम-पयोधि छलकत है।
क्या प्रेम की अतुल बड़ाई है, दीदार में तेरे झलकत है ।।
जौलाई
सन् 1963 में आपने श्री सन्त नगर के अन्तिम भाग्य जगाए। सेवा, सत्संग,
श्री दर्शन का सौभाग्य प्रदान करते हुए आपने यह वचन फ़रमाए-
साधारणतया
लोग भगवान को पाने की अभिलाषा रखते हैं। हर किसी के मुख से यही आवाज़
निकलती है कि ईश्वर मिल जाये, भगवान के दर्शन हो जायें। परन्तु ईश्वर,
भगवान अथवा मालिक क्या चीज़ है, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं। वह मालिक
केवल प्रेम-स्वरूप है। उसका वास्तविक स्वरूप प्रेम, प्यार, प्रीति और
मुहब्बत है। यह सारी सृष्टि उस कुल मालिक की रचना है और इस रचना का आधार
फ़कत मालिक का प्रेम ही है। विचारपूर्वक देखने से पता चलता है कि मालिक ने
अपनी सृष्टि की रचना में प्रेम को ही आधार बना रखा है। प्रेम के तागे में
ही सब दुनिया माला के मनकों की तरह पिरोई हुई है और इसी प्रेम की डोरी के
द्वारा ही जीव अपने मालिक के चरणों में पहुँच सकता है।
परन्तु इसके साथ दुनिया में माया और काल की रचना फैली हुई है। साधारण
दुनियावी जीव माया की इस रचना में लुभा जाते हैं और माया में लिप्त हो जाने
के कारण मालिक का सच्चा प्रेम उनके दिलों से लुप्त हो जाता है। जीव के
अन्दर सार-तत्त्व तो मालिक का शुद्ध एवं सच्चा प्रेम है, परन्तु माया की
रचना देख-देखकर जीव भूल जाता है क्योंकि माया की रचना ही ऐसी है, जैसा कि
सत्पुरुषों ने कहा है-
ए जियरा तैं अमर लोक को, पर् यो काल बस आई हो।
मनै सरूपी देव निरंजन, तोहि राख्यो भरमाई हो ।।
पाँच पचीस तीन को पिंजरा, ता में तो को राखै हो।
तो को बिसरि गई सुधि घर की, महिमा आपन भावै हो ।।
निरंकार निरगुन ह्वै माया, तो को नाच नचावै हो ।
चरम दृष्टि को कलफी दीन्हो, चौरासी भरमावै हो ।।
सतगुरु पीव जीव के रच्छक, ता सो करो मिलाना हो ।
जा के मिले परम सुख उपजै, पावो पद निर्बाना हो ।।
जुगन जुगन हम आय जुनाई, कोई कोई हंस हमारा हो ।
कहै कबीर तहाँ पहुँचाऊँ, सत्त पुरुष दरबारा हो।।
परम सन्त श्री कबीर साहिब जी
महापुरुष
समझाते हैं कि ऐ जीव! तू वास्तव में अमर लोक का वासी है, किन्तू काल के वश
में आ गया है। मन रूपी देवता ने तुझे भ्रम में डालकर अपने अधीन कर रखा है।
पाँच विषय- रस (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द), पच्चीस प्रकृतियां और तीन
गुण रूपी पिंजरे में मन ने कैद कर रखा है, इसलिए तू अपने वास्तविक ठिकाने
की सुधि भूला बैठा है। सूक्ष्म माया तुझे धोखे में फंसा कर नाच नचा रही है।
उसने तेरी आँखों पर नफ़सानियत की पट्टी बांध दी है और इस प्रकार चौरासी
लाख योनियों में भटका रही है। अब इस धोखे से छुटकारा क्योंकर होगा? इसकी
युक्ति भी बतलाते हैं कि सतगुरु कुल मालिक का स्वरूप हैं जोकि जीव की रक्षा
करने वाले हैं, तू उनसे मेल-मिलाप कर। उनके मिलने से परम सुख की प्राप्ति
होगी और तू अपने असली ठिकाने निर्वाण पद को पा लेगा। श्री क़बीर साहिब
फ़रमाते हैं कि सत्पुरुष तो युग-युग में जीवों को चिताने और जगाने के लिए
आते हैं, किन्तु कोई विरला भाग्यशाली जीव ही उन सत्पुरुषों के वचन मानने
वाला होता है। वही अपने आप को महापुरुषों की चरण-शरण में अर्पण करता है।
ऐसे जीव को महापुरुष वहां पहुँचाते हैं, जहां मालिक का धाम है। महापुरुष
जिस अनामी धाम से स्वयं आते हैं, उनके चरणों में जो प्रेम-प्रतीति करता है;
वे उसे प्रेम की पवित्र डोरी में खींचकर वहीं ले जाते हैं।
सत्पुरुषों
का संसार में अवतरण ही इसीलिए होता है कि वे अमरवाणी द्वारा जीव को
वास्तविक ठिकाने का भेद बतलाते हैं। गफ़लत और मौह के अन्धकार से निकालकर
प्रेम-भक्ति का सच्चा प्रकाश प्रदान करते हैं। सच्चा प्रेम प्राप्त करने का
साधन ही केवल यही है कि महापुरुषों की बाणी, उनके वचन और उनकी आज्ञा-मौज
अनुसार जीवन को बनाये। सौभाग्यशाली हैं वे जीव जिन्हें सत्पुरुषों की
शरण-संगति प्राप्त होती है। वे उनके बताए हुए मार्ग पर चलकर लोक-परलोक
संवार लेते हैं।
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