Thursday, August 4, 2016

03.08.2016

1962 में जब यहां (सन्त नगर में) भी अँगूर लगाने की मौज उठी तो इस मौज ने सन् 1963 में साकार रूप धारण किया। सेवकजन दिन रात एक करके इस मौज को पूरा करने में संलग्न थे। अँगूरों के लिए गड़ढे खोदे जा रहे थे। एक दिन मौजवश श्री सद्गुरुदेव महाराज जी ने सेवकों से प्रवचन फ़रमाए-
''सेवक का दर्जा सर्वोत्तम है। श्री सद्गुरुदेव महाराज जी के दर्शन करने, सत्संग व आज्ञानुसार सेवा करने में बहुत लाभ है, परन्तु शर्त यह है कि जीव को कुसंग व माया धोखा न देवें। सेवक के दर्जे को प्राप्त करने के लिए, सच्चे सेवक के पद के लिए सब तरसते हैं अर्थात चाह करते हैं। यदि सैकड़ों वर्ष भी तप किया जावे तो भी सेवक का दर्जा मिलना कठिन है। परमार्थ व गुरु दरबार की सेवा का बहुत महत्व है। सेवक श्रद्धा के साथ सेवा करे, आज्ञानुसार चले और अपनी सुरति की धारा इष्टदेव के चरणों में लगाए रखे, यही सेवक का कर्तव्य है।''
बेतार का तार (Wireless) एक वैज्ञानिक अविष्कार है। इसमें जहां भी सन्देश पहुँचाना हो, किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर एक समय में एक को ही वह पहुँच सकता है। इसके लिए विद्युत धारा तथा वायु-तरंग की ज़रूरत पड़ती है। आपमें तो वह आध्यात्मिक 'बेतार का तार' की शक्ति समाहित थी कि बिना किन्हीं उपकरणों के सैकड़ों लाखों मील दूर बैठे हुए, बिना किसी के सन्देश पहुँचाये हुए प्रेमी दिलों को बरबस खींचती थी। जिसने भी एक बार गुरु-भक्ति की अभिलाषा की, श्री आनन्दपुर के सम्राट, त्रिभुवन मोहन का नाम सुन लिया, बस! वह खिंचा चला आया। जिसने भी एक बार आपके श्री दर्शन किये, पुनः दर्शन पाने के लिए सदा व्याकुल बना रहा। जब तक उसने श्री आनन्दपुर के सम्राट को हृदय-सम्राट न बना लिया, उसे चैन कहां! उसने अपने नयनों की तृषा श्री दर्शन से बुझानी चाही, परन्तु अत्यधिक बढ़ती ही गई। इस प्रेम की सच्ची लटक से सांसारिक विषय-वासनाओं, मोह-आसक्ति आदि बन्धन से मुक्त होकर वह त्याग, वैराग्य और सेवा की मूर्ति बन गया। अब उसे जीने का ढंग आ गया। वह दुनिया में रहता हुआ भी निर्लिप्त हो गया। वह अपने वास्तविक ध्येय को पा गया।

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