आप कभी-कभी रात्रिकाल में पड़ोसियों के बच्चों को भी खेल के बहाने घर से भागने के लिए उत्साहित करते। जब पड़ोसी स्त्रियां अत्यधिक तंग आतीं, तो वे उलाहना देने आपके घर आ पहुँचतीं। आपकी फूफीजी आपसे कुछ कहना ही चाहतीं कि आप तनिक मुसकरा देते। न जाने फूफीजी पर कैसा जादू का सा प्रभाव हो जाता कि वे चुपके से सब उलाहनों का उत्तर मुसकराहट में ही दे देतीं। कभी अत्यधिक उलाहने मिलने पर जब वे अन्य पड़ोसिन स्त्रियों के सामने आपको डांटतीं तो आप सरल स्वभाव से उत्तर देते कि ""मैं कब किसी को कहता हूँ कि मेरे साथ चलो। मैं अपनी प्रिय वस्तु (निजी-वस्तु) की खोज में जाता हूँ, उलटा वे ही मेरी इस वस्तु की टोह लेने लगते हैं कि मैं क्या ढूँढ़ने जाता हूँ।'' इस गम्भीर रहस्य का अर्थ न समझकर सभी स्त्रियां मौन हो जातीं। "निजी वस्तु का ढूँढना' अर्थात् अपने परमपिता परमात्मा से मिलाप करना। जनसाधारण जिस बाल्यकाल को क्रीड़ा में, यौवन को विषयों में तथा बुढ़ापे को इच्छाओं की तरंगों में खो देते हैं, यह दिव्य विभूति बाल्यकाल में ही निजी वस्तु की खोज में संलग्न है।
आज प्रेम लीलाओं से उल्लसित द्वापर युग ने मानो फिर से पदार्पण किया था। आपकी मनोहारी आकर्षण शक्ति से सभी बालक स्वयं ही खिंचे चले आते। आप गली-मुहल्ले में भी सबको प्यारे लगते। आप उन सब बच्चों में एक अनूठी आभा लिए हुए दिखाई देते थे। आपने द्वापर युग की लीला को नया रंग देकर कलियुग को कृतार्थ किया। क्या बाल्यकाल की ये लीलाएँ मधुमय भविष्य की सूचना नहीं दे रही थीं? जीवन के सम्पूर्ण रहस्यों का आभास बाल्यकाल की झलकियों में ही दिखाई देता है।
आपके पिता जी धार्मिक वृत्ति तथा सरल स्वभाव के भद्र पुरुष थे। वे आरम्भ से ही श्रीकृष्ण जी के उपासक थे। साथ-साथ गुरुवाणी के पाठ में भी उनकी अपार श्रद्धा थी। "आसा दी वार' की एक पोथी वे सदा अपने पास रखते थे। जहां कहीं भी जाते, यह पोथी उनकी जेब में रखी रहती थी, जिसका वे नियम-पूर्वक नित्यप्रति पाठ करते थे। वे सदा आपको रात्रि के समय धार्मिक कथाएं ही सुनाया करते थे। उनके इस सरल जीवन का प्रभाव भी आप पर पड़ा। आप भी धार्मिक पुस्तकों के धार्मिक विचारों को ध्यानपूर्वक सुना करते।