Friday, March 25, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज

आप कभी-कभी रात्रिकाल में पड़ोसियों के बच्चों को भी खेल के बहाने घर से भागने के लिए उत्साहित करते। जब पड़ोसी स्त्रियां अत्यधिक तंग आतींतो वे उलाहना देने आपके घर आ पहुँचतीं। आपकी फूफीजी आपसे कुछ कहना ही चाहतीं कि आप तनिक मुसकरा देते। न जाने फूफीजी पर कैसा जादू का सा प्रभाव हो जाता कि वे चुपके से सब उलाहनों का उत्तर मुसकराहट में ही दे देतीं। कभी अत्यधिक उलाहने मिलने पर जब वे अन्य पड़ोसिन स्त्रियों के सामने आपको डांटतीं तो आप सरल स्वभाव से उत्तर देते कि ""मैं कब किसी को कहता हूँ कि मेरे साथ चलो। मैं अपनी प्रिय वस्तु (निजी-वस्तु) की खोज में जाता हूँउलटा वे ही मेरी इस वस्तु की टोह लेने लगते हैं कि मैं क्या ढूँढ़ने जाता हूँ।'' इस गम्भीर रहस्य का अर्थ न समझकर सभी स्त्रियां मौन हो जातीं। "निजी वस्तु का ढूँढनाअर्थात् अपने परमपिता परमात्मा से मिलाप करना। जनसाधारण जिस बाल्यकाल को क्रीड़ा मेंयौवन को विषयों में तथा बुढ़ापे को इच्छाओं की तरंगों में खो देते हैंयह दिव्य विभूति बाल्यकाल में ही निजी वस्तु की खोज में संलग्न है।
आज प्रेम लीलाओं से उल्लसित द्वापर युग ने मानो फिर से पदार्पण किया था। आपकी मनोहारी आकर्षण शक्ति से सभी बालक स्वयं ही खिंचे चले आते। आप गली-मुहल्ले में भी सबको प्यारे लगते। आप उन सब बच्चों में एक अनूठी आभा लिए हुए  दिखाई देते थे। आपने द्वापर युग की लीला को नया रंग देकर कलियुग को कृतार्थ किया। क्या बाल्यकाल की ये लीलाएँ मधुमय भविष्य की सूचना नहीं दे रही थींजीवन के सम्पूर्ण रहस्यों का आभास बाल्यकाल की झलकियों में ही दिखाई देता है।
आपके पिता जी धार्मिक वृत्ति तथा सरल स्वभाव के भद्र पुरुष थे। वे आरम्भ से ही श्रीकृष्ण जी के उपासक थे। साथ-साथ गुरुवाणी के पाठ में भी उनकी अपार श्रद्धा थी। "आसा दी वारकी एक पोथी वे सदा अपने पास रखते थे। जहां कहीं भी जातेयह पोथी उनकी जेब में रखी रहती थीजिसका वे नियम-पूर्वक नित्यप्रति पाठ करते थे। वे सदा आपको रात्रि के समय धार्मिक कथाएं ही सुनाया करते थे। उनके इस सरल जीवन का प्रभाव भी आप पर पड़ा। आप भी धार्मिक पुस्तकों के धार्मिक विचारों को ध्यानपूर्वक सुना करते।

Wednesday, March 23, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज -22.03.2016

एक दिन मेघाच्छन्न अमावस्या की अन्धकारमयी रात्रि में जब आसमान पर सितारों का नामोनिशान भी न थाहाथ को हाथ भी दिखाई न देता थानभमण्डल पर इन्द्रदेव अपने दल-बल सहित अपना पराक्रम दिखा रहे थेऐसी भयावनी रात्रि में जब कोई घर की छत पर भी चढ़ने से भय खाता हैतब आप सबको सोया हुआ जानकर घर से निकल पड़े। आपके पिता जी भी चुपके से आपके पीछे हो लिए। मार्ग में उन्होंने क्या देखा कि ऐसे घने अंधकार में एक प्रकाश की रेखा आपके आगे-आगे चल रही है व आप उस प्रकाश की रेखा की पगडंडी पर तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए भागे जा रहे हैं। इतने में कुछ दूरी पर लुटेरे पठानों की आहट सुनाई दी। आपके पिताजी कुछ भयभीत हो गए। आप आगे की ओर बढ़ते ही जा रहे थे। इतने में वह प्रकाश की रेखा आपके चारों ओर किरणें फैलाने लगी। आपके पिताजी आपको पकड़ने की चेष्टा करतेपरन्तु प्रकाश में चलते हुए आप उनके हाथ न आते।
इसी समय में वे पठान भी निकट आ पहुँचे। अब तो पिताजी की व्याकुलता का ठिकाना न रहा। इधर प्रकाश की किरणों का विस्तार आरम्भ हो गया। आपके चारों ओर पांच फुट की दूरी तक किरणों ने घेरा डाल लिया। लुटेरे पठान आपके समीप पहुँचने का प्रयत्न करतेपरन्तु उस घेरे के अन्दर न आ पाते। उन्होंने दूर से इस रोशनी को देखकर यह समझा था कि यहां कोई मणि चमक रही है। समीप आकर कुछ और ही कौतुक देखा। उनके कदम लड़खड़ा गए और वे घने अन्धकार में कहीं पीछे ही रह गए।
आपके पिताजी उसी दिव्य ज्योति के प्रकाश में खिंचे-खिंचे एक रेतीले टिब्बे के समीप जा पहुँचे। आप वहां जाकर नयन मूँदकर बैठ गए। आपके मस्तक पर एक दिव्य ज्योति की आभा जगमगा रही थी। आपके पिताजी का ह्मदय भय से घबरा रहा था। उन्होंने विवशतापूर्वक आपको उठाया और कहा----""बेटा! जब चाँद निकले तो चाँदनी रात में अपनी वस्तु ढूँढ़ने आया करो। अंधकार में किसी वस्तु का ढूँढ़ना कठिन हो जाता है।'' आपने मुसकराकर उत्तर दिया कि चाँद तो निकला हुआ है। क्या आप अंधकार में यहां तक पहुँचे हैंदेखो! चांदनी है या नहींस्वयं पिताजी का हाथ पकड़कर उसी प्रकाश को साथ लिए घर लौट आए। पिताजी ने तो समझा कि अब पूर्ण रात्रि व्यतीत हो चुकी है। उनके मन में कुछ उल्लासकुछ घबराहटकुछ उत्तेजना थी जिससे उनके दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी। ज्योंही घर पहुँचेतो शीघ्रता से आपको गोद में उठाकर किवाड़ बंद कर दिया। ओह! कैसी अद्भुत लीला है कि अभी रात्रि का एक घण्टा व्यतीत हुआ था। घर में सभी अन्य प्राणी सुख से गहरी निद्रा में सो रहे थे। पिताजी ने मन ही मन सोचा कि अब मैं इसे कुछ भी न कहूँगा। दिव्य आत्माएँ तो दिव्य कार्य करने के लिए संसार में आती हैंयह भी कोई दिव्य विभूति ही है----ऐसा सोचकर सो गए। प्रात: होते ही आपकी माया ने उनके ह्मदय पर ऐसा पर्दा डाला कि वे रात्रि की सब घटना भूल गए और पितृ-सुलभ स्नेह आप पर बरसाने लगे।

Tuesday, March 22, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज जी

एक दिन आप रेतीले टीलों के समीप खेल रहे थे। फूफी जी आपको ढूँढ़ते हुए वहां पर जा पहुँची। क्या देखती हैं कि आप एक ऊँचे टीले पर चढ़कर सब बच्चों को एकत्रित कर स्वयं सम्राट् बनकर मंत्रीउपमंत्री तथा अन्य पदों पर बच्चों को नियुक्त कर हर एक को अपना-अपना कार्य करने की आज्ञा प्रदान कर रहे हैं। चुपके से पहले तो सब क्रीड़ा फूफी जी छुपकर देखती रहींपुन: सामने आकर कहने लगीं----चलो घरइधर सब बच्चों को क्यों ले आएकभी फ़कीरी का आनन्द लेते होतो कभी सम्राट् बन बैठते हो----हां ! यही सम्राट् बनना ही आपके साथ शोभा देता है। आपने सहज स्वभाव फ़रमाया कि न केवल सम्राट् बनना ही अच्छा है न बिल्कुल फ़कीरहमें तो "शाहनशाही फ़कीरीसे काम है। कितने रहस्य भरे मधुर वचन थे ये। "शाहनशाही फ़कीरीजिसे भविष्य में केवल कथनमात्र ही न रखकर कार्यरूप में परिणित किया और साथ में ही श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज के उपदेशानुसार राजयोग का उद्घाटन कर दिया। नन्हीं कोंपलों में जो रस होता है वही फूलों और फलों में अमृत का काम करता है। बाल्यकाल की झांकियां ही किसी असाधारण भविष्य की ओर संकेत किया करती हैं।
कभी-कभी आप रात्रि के समय घर से भाग कर टीलों की ओर जाने का प्रयत्न करते। फूफी जी व पिता जी आपको बलपूर्वक पकड़कर कहते कि इस समय कौनसा खेल शेष बचा है जो पूरा नहीं हुआ। आप कुछ समय तक मौन रहतेफिर उत्तर देते कि अमुक टीले के समीप मैं सुबह कुछ भूल आया हूँउसे लेने के लिए जाना है। इस प्रकार कई बार आपको रात्रि के समय बाहर जाने से रोक लिया गया।
आपकी आयु लगभग छ: सात वर्ष की हुई होगीजब आप बार-बार घर से भागने का प्रयत्न करते और आपको हर बार रोका जाता। एक दिन पिता जी के दिल में ख़्याल आया कि कौनसी ऐसी वस्तु है जिसके पीछे यह बालक इतना दीवाना बना रहता है। अब जब भी रात्रि में घर से भागे तो इसे रोकना उचित नहीं। पीछे जाकर देख लेंगे कि किस वस्तु को ढूँढ़ने जाता है। आपने फूफी जी को भी समझा दिया कि अब जब भी यह रात में बाहर जाने लगे तो इसे मत रोकना।

Sunday, March 20, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज

अब पूज्य माता जी मन में विचारने लगीं कि बड़े-बूढ़ों से प्राय: यह सुना जाता है कि या तो मणियुक्त शिशु की आयु बहुत कम होती है या उसकी माता की। वे दिल ही दिल में आपकी दीर्घ आयु के लिए बलैयां लेने लगीं। आपजी की पूज्य मातुश्री सत्त्वगुण प्रधान साधु प्रकृति की थीं। काश! कि पूज्य माता जी  को आपकी पावन अद्भुत लीलाओं को निरखने का समय मिलतापरन्तु ऐसा न हुआ। वे इस विलक्षण गुणों से युक्त विभूति को जन्म देकर कुछ समय बाद इस संसार से चल बसीं। नामकरण के दिन आपका शुभ नाम श्री द्वारा राम जी रखा गया। पण्डित जी ने उस दिन आपके मस्तक पर एक अति दिव्य ज्योति देखी। पुन: उन्होंने जब श्री चरण-कमलों तथा कर-कमलों को निहारा तो एक अलौकिक महापुरुष के चिन्हों व चक्रों से युक्त पाया। उन्होंने मन ही मन प्रसन्न होकर वन्दना की। केवल इतने ही शब्द मुख से उच्चरित कर मौन हो गये कि यह तो कोई विलक्षण बालक ही दिखाई देता है। मुखमण्डल निहार-निहार कर अपने को कृतार्थ करने लगे। बस मन में एक वेदना भरी हूक उठी जिसे ओठों के बीच ही गुनगुना कर रह गए----वे पंडित जी। वह हूक थी----""काश! मैं भी इतने समय तक जीवित रह सकूँ जिससे इस शिशु के बढ़ते हुए यश व पावन लीलाओं को निरख सकूँ।''
आपकी अवस्था अभी बालपन तक भी न पहुँची थी कि आप मातृ-सुलभ स्नेह से वंचित हो गए। आपके पालन-पोषण का सौभाग्य आपकी फूफी जी को मिला। वे बड़े लाड़-प्यार से आपको पुचकारतीं तथा मातृ-वात्सल्य एवं प्यार से परिपूर्ण करने का प्रयत्न करतीं, परन्तु जिनमें अपने आप में ही एक दिव्य आनन्द व त्रिलोकी को प्रेम प्रदान करने की शक्ति निहित थी, वे इस स्वयं निर्मित प्यार को क्या जानें। आपकी आयु जब लगभग चार-पांच वर्ष की हुई, तभी आपने लक्की (भाग्यशालिनी नगरी) के भाग्य जगाने के लिए बाल-सुलभ क्रीड़ाएँ आरम्भ कर दीं। जानबूझ कर रूठ जाना, किसी टीले के समीप बैठकर निज आत्म-स्वरूप का आनन्द लेना, आँख मिचौनी के दृश्य व मधुर भाषा में फूफी जी के दिल को बहलाना, कभी तन पर धूलि रमाकर मुसकराना, आपकी प्रिय क्रीड़ाएँ थीं। फूफी जी आपको कहतीं----""बेटा! इतने उच्च तथा धन-धान्य सम्पन्न कुल में जन्म लेकर धूलि में लोटना अच्छा नहीं।'' आप बड़े गर्व से उत्तर देते कि ""फ़कीरी में तो जीवन का रस भरा हुआ है।'' आपके इन वचनों को सुनकर फूफी जी बहुत उदास होतीं और सोचने लगतीं कि क्या इस बच्चे का भविष्य ऐसा ही होगा ? पण्डित जी ने तो अनुपम गुणसम्पन्न कहा था, परन्तु  यह तो फ़कीर बनना चाहता है।

Friday, March 18, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज- अवतरण

असम तथा रेतीले टीलों युक्त, उर्वरा स्थान को निज बाल सुलभ क्रीड़ाओं से सरसाने तथा भूमि को भाग्यशालिनीविशेष महत्त्वदायिनी बनाने के लिए प्रेम के भंडारभक्ति-परमार्थ के सूर्यमानव जगत के भाग्य निर्माताजन समाज को सरस तथा प्रफुल्लित बनाने के लिए सन्त स्वरूप में प्रकट हुए श्री श्री 108 श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी महाराज। आप उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रान्त के लक्की मरवत् ज़िला बन्नू के एक उच्चविख्यात कथूरिया कुल में 13 अप्रैल सन् 1898 ईस्वी तदनुसार वैशाख संक्रान्ति संवत् 1955 विक्रमी बुधवार के शुभ दिन व शुभ मुहूत्र्त में अवतरित हुए। पूज्य श्री बेलाराम जी को आपके पिताजी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माता जी ने आपको प्राप्त कर एक अलौकिक आनन्द का अनुभव किया। यह अलौकिक ज्योति सारे विश्व में दिव्य आलोक भरने आई थी न कि केवल किसी एक विशेष परिवार के लिए यह ज्योति प्रकट हुई।
जन्म के समय ही अधरों पर पुष्पों-सी मुस्कान, रक्तिम कपोल तथा मस्तक पर एक दिव्य ज्योति की आभा शोभायमान थी। चरण-कमलों पर अवतारी महापुरुषों जैसे चक्र-चिन्ह थे। जन्म के समय जो अन्य आत्मीय स्त्रियां पास में खड़ी थींउन्होंने देखा कि आपके मस्तक के ऊपर की ओर एक कान से दूसरे कान तक गोलाकार प्रकाश की रेखा है। पुन: उस कमरे में से आती हुई इत्रफुलेलादि की अलौकिक सुगन्धि प्रतीत हुई। वे एक-दूसरे से धीरे-धीरे कहने लगीं---""बालक तो कोई चमत्कारी महापुरुषों के लक्षणों से युक्त लगता हैपरन्तु इस समय इत्र-फुलेलादि की सुगन्धि कहां से आ रही है।'' इतना कहकर वे सारे कमरे में सुगन्धित वस्तुओं को ढूँढने लगींताकि उन्हें वहां से हटाकर बाहर रख दिया जाय, परन्तु वे कहीं से भी प्राप्त न हो पार्इं। इसी समय में माता जी ने तनिक अपना सिर उठाकर देखा तो उस शिशु के मस्तक पर मणि जैसा प्रकाश दिखाई दिया। उन्होंनेे शिशु को वस्त्र से ढांप दिया। कुछ ही क्षणों में वह प्रकाश तथा सुगन्धि अगोचर हो गई। 

Thursday, March 17, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज

परमार्थ-पथ के उन्नायकह्मदय-सम्राट्महाराजाधिराजप्रेम के जाज्वल्यमान भास्कर श्री तृतीय पादशाही जी के स्वरूप में अवतरित हुए। आपने आत्र्तविकलदुःखी जीवों पर ऐसी प्रेम-वृष्टि की जिससे सर्वसाधारण जन भी कृतार्थ हो गये। आपकी प्रेम-भक्ति अनूठे रूप में सबके सम्मुख आई। जिसने भी इस प्रेम-सरोवर में डुबकी लगाईवह कृतकृत्य हो गया। आपकी सुमंजुलसरसमनोहारी पावन लीलाओं का गुणानुवाद करने में लेखनी असमर्थ हैजिह्वा अशक्त हैशेशशारदाग्रन्थश्रुतियां भी नेति-नेति शब्द उच्चारण कर मौन हो जाती हैं। श्री परमहंस अवतार जी की उन्हीं पावन दिव्यतम जीवन की लीलाओं को सूर्य की एक किरणसमुद्र की एक तरंगसुरभित उद्यान की एक पुष्प-मंजरी के रूप में यहां प्रस्तुत किया गया हैजिसका रसपान कर सब प्रेमीजन आनन्द-विभोर होकर जीवन सफल बनावें।
अवतरण
प्रकृति ने प्रत्येक दिशा में रंग छिटकाया। लहलहाते खेतों ने पक्की फसलों के रूप में समस्त वसुन्धरा को स्वर्णिम ही स्वर्णिम कर दिया। अमराइयों पर कोकिला ने मीठे स्वर से राग अलापे। आज सूर्यदेव भी पूर्व दिशा के रथ पर छुप-छुप कर अपनी अरुणिम आभा निरखा रहे हैंक्योंकि वे किसी अज्ञात देश से प्रकट होने वाले देदीप्यमान भास्कर के सम्मुख अपनी रश्मियों को क्षीण पाकर लजा रहे हैं। ऊषा वेला ने मुक्ताकण हरी-हरी घास पर बिखेर कर मख़मली ग़लीचे से उद्यानों को ढक दिया। सब ओर हर्ष ही हर्षउल्लास ही उल्लास छाया है और दसों दिशाओं में सुगन्धियुक्त समीर सौरभ बरसा रहा है। इन्द्रदेव अपनी छटा दिखाने के लिए प्रसन्नता में झूम उठे। स्वर्ग के देवता भी इस पृथ्वी पर अवतरित होने वाली विभूति को निरखने के लिए लालायित होने लगे। दसों दिशाएं आलोक से आलोकित हो गर्इं। क्या कोई युग पलटेगाक्या प्रेमियों की बहारें हैंक्या भक्तों एवं मालिक के प्यारों के ह्मदय की आत्र्त पुकारों की सुनाई होने वाली हैयह कैसा अनूठा रंगकैसा ह्मदय में उल्लास का सागर छलक रहा है। आज चहुँ दिशि कैसा नज़ारा है----
अमिय  बरस  रहा  है,  वसुधा  पे  फुहारों  में ।
भरा उल्लास है अनुपम,  झूमती हुई बहारों में ।।
छिटका अजब नया रंग है,  कुदरत के नज़ारों में ।
दिव्य प्रकाश भर आया,  गगन के चाँद सितारों में ।।
प्रभु-प्रेमी  हिय  सागरअन्तर ही में उल्लसाय ।
कि ज्यों पूनम विधु पाकर,  हर्ष में सागर लहराय ।।
अमर परमहंसों की ज्योति,  ध्वजा भक्ति की फहराय ।
मिटाने  प्यास  रूहों  की,  प्रेम-भण्डारी  प्रकटाय ।।