Thursday, March 17, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज

परमार्थ-पथ के उन्नायकह्मदय-सम्राट्महाराजाधिराजप्रेम के जाज्वल्यमान भास्कर श्री तृतीय पादशाही जी के स्वरूप में अवतरित हुए। आपने आत्र्तविकलदुःखी जीवों पर ऐसी प्रेम-वृष्टि की जिससे सर्वसाधारण जन भी कृतार्थ हो गये। आपकी प्रेम-भक्ति अनूठे रूप में सबके सम्मुख आई। जिसने भी इस प्रेम-सरोवर में डुबकी लगाईवह कृतकृत्य हो गया। आपकी सुमंजुलसरसमनोहारी पावन लीलाओं का गुणानुवाद करने में लेखनी असमर्थ हैजिह्वा अशक्त हैशेशशारदाग्रन्थश्रुतियां भी नेति-नेति शब्द उच्चारण कर मौन हो जाती हैं। श्री परमहंस अवतार जी की उन्हीं पावन दिव्यतम जीवन की लीलाओं को सूर्य की एक किरणसमुद्र की एक तरंगसुरभित उद्यान की एक पुष्प-मंजरी के रूप में यहां प्रस्तुत किया गया हैजिसका रसपान कर सब प्रेमीजन आनन्द-विभोर होकर जीवन सफल बनावें।
अवतरण
प्रकृति ने प्रत्येक दिशा में रंग छिटकाया। लहलहाते खेतों ने पक्की फसलों के रूप में समस्त वसुन्धरा को स्वर्णिम ही स्वर्णिम कर दिया। अमराइयों पर कोकिला ने मीठे स्वर से राग अलापे। आज सूर्यदेव भी पूर्व दिशा के रथ पर छुप-छुप कर अपनी अरुणिम आभा निरखा रहे हैंक्योंकि वे किसी अज्ञात देश से प्रकट होने वाले देदीप्यमान भास्कर के सम्मुख अपनी रश्मियों को क्षीण पाकर लजा रहे हैं। ऊषा वेला ने मुक्ताकण हरी-हरी घास पर बिखेर कर मख़मली ग़लीचे से उद्यानों को ढक दिया। सब ओर हर्ष ही हर्षउल्लास ही उल्लास छाया है और दसों दिशाओं में सुगन्धियुक्त समीर सौरभ बरसा रहा है। इन्द्रदेव अपनी छटा दिखाने के लिए प्रसन्नता में झूम उठे। स्वर्ग के देवता भी इस पृथ्वी पर अवतरित होने वाली विभूति को निरखने के लिए लालायित होने लगे। दसों दिशाएं आलोक से आलोकित हो गर्इं। क्या कोई युग पलटेगाक्या प्रेमियों की बहारें हैंक्या भक्तों एवं मालिक के प्यारों के ह्मदय की आत्र्त पुकारों की सुनाई होने वाली हैयह कैसा अनूठा रंगकैसा ह्मदय में उल्लास का सागर छलक रहा है। आज चहुँ दिशि कैसा नज़ारा है----
अमिय  बरस  रहा  है,  वसुधा  पे  फुहारों  में ।
भरा उल्लास है अनुपम,  झूमती हुई बहारों में ।।
छिटका अजब नया रंग है,  कुदरत के नज़ारों में ।
दिव्य प्रकाश भर आया,  गगन के चाँद सितारों में ।।
प्रभु-प्रेमी  हिय  सागरअन्तर ही में उल्लसाय ।
कि ज्यों पूनम विधु पाकर,  हर्ष में सागर लहराय ।।
अमर परमहंसों की ज्योति,  ध्वजा भक्ति की फहराय ।
मिटाने  प्यास  रूहों  की,  प्रेम-भण्डारी  प्रकटाय ।।

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