परमार्थ-पथ के उन्नायक, ह्मदय-सम्राट्, महाराजाधिराज, प्रेम के जाज्वल्यमान भास्कर श्री तृतीय पादशाही जी के स्वरूप में अवतरित हुए। आपने आत्र्त, विकल, दुःखी जीवों पर ऐसी प्रेम-वृष्टि की जिससे सर्वसाधारण जन भी कृतार्थ हो गये। आपकी प्रेम-भक्ति अनूठे रूप में सबके सम्मुख आई। जिसने भी इस प्रेम-सरोवर में डुबकी लगाई, वह कृतकृत्य हो गया। आपकी सुमंजुल, सरस, मनोहारी पावन लीलाओं का गुणानुवाद करने में लेखनी असमर्थ है, जिह्वा अशक्त है; शेश, शारदा, ग्रन्थ, श्रुतियां भी नेति-नेति शब्द उच्चारण कर मौन हो जाती हैं। श्री परमहंस अवतार जी की उन्हीं पावन दिव्यतम जीवन की लीलाओं को सूर्य की एक किरण, समुद्र की एक तरंग, सुरभित उद्यान की एक पुष्प-मंजरी के रूप में यहां प्रस्तुत किया गया है, जिसका रसपान कर सब प्रेमीजन आनन्द-विभोर होकर जीवन सफल बनावें।
अवतरण
प्रकृति ने प्रत्येक दिशा में रंग छिटकाया। लहलहाते खेतों ने पक्की फसलों के रूप में समस्त वसुन्धरा को स्वर्णिम ही स्वर्णिम कर दिया। अमराइयों पर कोकिला ने मीठे स्वर से राग अलापे। आज सूर्यदेव भी पूर्व दिशा के रथ पर छुप-छुप कर अपनी अरुणिम आभा निरखा रहे हैं, क्योंकि वे किसी अज्ञात देश से प्रकट होने वाले देदीप्यमान भास्कर के सम्मुख अपनी रश्मियों को क्षीण पाकर लजा रहे हैं। ऊषा वेला ने मुक्ताकण हरी-हरी घास पर बिखेर कर मख़मली ग़लीचे से उद्यानों को ढक दिया। सब ओर हर्ष ही हर्ष, उल्लास ही उल्लास छाया है और दसों दिशाओं में सुगन्धियुक्त समीर सौरभ बरसा रहा है। इन्द्रदेव अपनी छटा दिखाने के लिए प्रसन्नता में झूम उठे। स्वर्ग के देवता भी इस पृथ्वी पर अवतरित होने वाली विभूति को निरखने के लिए लालायित होने लगे। दसों दिशाएं आलोक से आलोकित हो गर्इं। क्या कोई युग पलटेगा? क्या प्रेमियों की बहारें हैं? क्या भक्तों एवं मालिक के प्यारों के ह्मदय की आत्र्त पुकारों की सुनाई होने वाली है? यह कैसा अनूठा रंग, कैसा ह्मदय में उल्लास का सागर छलक रहा है। आज चहुँ दिशि कैसा नज़ारा है----
अमिय बरस रहा है, वसुधा पे फुहारों में ।
भरा उल्लास है अनुपम, झूमती हुई बहारों में ।।
छिटका अजब नया रंग है, कुदरत के नज़ारों में ।
दिव्य प्रकाश भर आया, गगन के चाँद सितारों में ।।
प्रभु-प्रेमी हिय सागर, अन्तर ही में उल्लसाय ।
कि ज्यों पूनम विधु पाकर, हर्ष में सागर लहराय ।।
अमर परमहंसों की ज्योति, ध्वजा भक्ति की फहराय ।
मिटाने प्यास रूहों की, प्रेम-भण्डारी प्रकटाय ।।
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