असम तथा रेतीले टीलों युक्त, उर्वरा स्थान को निज बाल सुलभ क्रीड़ाओं से सरसाने तथा भूमि को भाग्यशालिनी, विशेष महत्त्वदायिनी बनाने के लिए प्रेम के भंडार, भक्ति-परमार्थ के सूर्य, मानव जगत के भाग्य निर्माता, जन समाज को सरस तथा प्रफुल्लित बनाने के लिए सन्त स्वरूप में प्रकट हुए श्री श्री 108 श्री स्वामी वैराग्य आनन्द जी महाराज। आप उत्तर-पश्चिमी सीमाप्रान्त के लक्की मरवत् ज़िला बन्नू के एक उच्च, विख्यात कथूरिया कुल में 13 अप्रैल सन् 1898 ईस्वी तदनुसार वैशाख संक्रान्ति संवत् 1955 विक्रमी बुधवार के शुभ दिन व शुभ मुहूत्र्त में अवतरित हुए। पूज्य श्री बेलाराम जी को आपके पिताजी कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। माता जी ने आपको प्राप्त कर एक अलौकिक आनन्द का अनुभव किया। यह अलौकिक ज्योति सारे विश्व में दिव्य आलोक भरने आई थी न कि केवल किसी एक विशेष परिवार के लिए यह ज्योति प्रकट हुई।
जन्म के समय ही अधरों पर पुष्पों-सी मुस्कान, रक्तिम कपोल तथा मस्तक पर एक दिव्य ज्योति की आभा शोभायमान थी। चरण-कमलों पर अवतारी महापुरुषों जैसे चक्र-चिन्ह थे। जन्म के समय जो अन्य आत्मीय स्त्रियां पास में खड़ी थीं, उन्होंने देखा कि आपके मस्तक के ऊपर की ओर एक कान से दूसरे कान तक गोलाकार प्रकाश की रेखा है। पुन: उस कमरे में से आती हुई इत्र, फुलेलादि की अलौकिक सुगन्धि प्रतीत हुई। वे एक-दूसरे से धीरे-धीरे कहने लगीं---""बालक तो कोई चमत्कारी महापुरुषों के लक्षणों से युक्त लगता है, परन्तु इस समय इत्र-फुलेलादि की सुगन्धि कहां से आ रही है।'' इतना कहकर वे सारे कमरे में सुगन्धित वस्तुओं को ढूँढने लगीं, ताकि उन्हें वहां से हटाकर बाहर रख दिया जाय, परन्तु वे कहीं से भी प्राप्त न हो पार्इं। इसी समय में माता जी ने तनिक अपना सिर उठाकर देखा तो उस शिशु के मस्तक पर मणि जैसा प्रकाश दिखाई दिया। उन्होंनेे शिशु को वस्त्र से ढांप दिया। कुछ ही क्षणों में वह प्रकाश तथा सुगन्धि अगोचर हो गई।
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