Wednesday, March 23, 2016

श्री तृतीय पादशाही जी महाराज -22.03.2016

एक दिन मेघाच्छन्न अमावस्या की अन्धकारमयी रात्रि में जब आसमान पर सितारों का नामोनिशान भी न थाहाथ को हाथ भी दिखाई न देता थानभमण्डल पर इन्द्रदेव अपने दल-बल सहित अपना पराक्रम दिखा रहे थेऐसी भयावनी रात्रि में जब कोई घर की छत पर भी चढ़ने से भय खाता हैतब आप सबको सोया हुआ जानकर घर से निकल पड़े। आपके पिता जी भी चुपके से आपके पीछे हो लिए। मार्ग में उन्होंने क्या देखा कि ऐसे घने अंधकार में एक प्रकाश की रेखा आपके आगे-आगे चल रही है व आप उस प्रकाश की रेखा की पगडंडी पर तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए भागे जा रहे हैं। इतने में कुछ दूरी पर लुटेरे पठानों की आहट सुनाई दी। आपके पिताजी कुछ भयभीत हो गए। आप आगे की ओर बढ़ते ही जा रहे थे। इतने में वह प्रकाश की रेखा आपके चारों ओर किरणें फैलाने लगी। आपके पिताजी आपको पकड़ने की चेष्टा करतेपरन्तु प्रकाश में चलते हुए आप उनके हाथ न आते।
इसी समय में वे पठान भी निकट आ पहुँचे। अब तो पिताजी की व्याकुलता का ठिकाना न रहा। इधर प्रकाश की किरणों का विस्तार आरम्भ हो गया। आपके चारों ओर पांच फुट की दूरी तक किरणों ने घेरा डाल लिया। लुटेरे पठान आपके समीप पहुँचने का प्रयत्न करतेपरन्तु उस घेरे के अन्दर न आ पाते। उन्होंने दूर से इस रोशनी को देखकर यह समझा था कि यहां कोई मणि चमक रही है। समीप आकर कुछ और ही कौतुक देखा। उनके कदम लड़खड़ा गए और वे घने अन्धकार में कहीं पीछे ही रह गए।
आपके पिताजी उसी दिव्य ज्योति के प्रकाश में खिंचे-खिंचे एक रेतीले टिब्बे के समीप जा पहुँचे। आप वहां जाकर नयन मूँदकर बैठ गए। आपके मस्तक पर एक दिव्य ज्योति की आभा जगमगा रही थी। आपके पिताजी का ह्मदय भय से घबरा रहा था। उन्होंने विवशतापूर्वक आपको उठाया और कहा----""बेटा! जब चाँद निकले तो चाँदनी रात में अपनी वस्तु ढूँढ़ने आया करो। अंधकार में किसी वस्तु का ढूँढ़ना कठिन हो जाता है।'' आपने मुसकराकर उत्तर दिया कि चाँद तो निकला हुआ है। क्या आप अंधकार में यहां तक पहुँचे हैंदेखो! चांदनी है या नहींस्वयं पिताजी का हाथ पकड़कर उसी प्रकाश को साथ लिए घर लौट आए। पिताजी ने तो समझा कि अब पूर्ण रात्रि व्यतीत हो चुकी है। उनके मन में कुछ उल्लासकुछ घबराहटकुछ उत्तेजना थी जिससे उनके दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी। ज्योंही घर पहुँचेतो शीघ्रता से आपको गोद में उठाकर किवाड़ बंद कर दिया। ओह! कैसी अद्भुत लीला है कि अभी रात्रि का एक घण्टा व्यतीत हुआ था। घर में सभी अन्य प्राणी सुख से गहरी निद्रा में सो रहे थे। पिताजी ने मन ही मन सोचा कि अब मैं इसे कुछ भी न कहूँगा। दिव्य आत्माएँ तो दिव्य कार्य करने के लिए संसार में आती हैंयह भी कोई दिव्य विभूति ही है----ऐसा सोचकर सो गए। प्रात: होते ही आपकी माया ने उनके ह्मदय पर ऐसा पर्दा डाला कि वे रात्रि की सब घटना भूल गए और पितृ-सुलभ स्नेह आप पर बरसाने लगे।

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