एक दिन आप रेतीले टीलों के समीप खेल रहे थे। फूफी जी आपको ढूँढ़ते हुए वहां पर जा पहुँची। क्या देखती हैं कि आप एक ऊँचे टीले पर चढ़कर सब बच्चों को एकत्रित कर स्वयं सम्राट् बनकर मंत्री, उपमंत्री तथा अन्य पदों पर बच्चों को नियुक्त कर हर एक को अपना-अपना कार्य करने की आज्ञा प्रदान कर रहे हैं। चुपके से पहले तो सब क्रीड़ा फूफी जी छुपकर देखती रहीं, पुन: सामने आकर कहने लगीं----चलो घर, इधर सब बच्चों को क्यों ले आए? कभी फ़कीरी का आनन्द लेते हो, तो कभी सम्राट् बन बैठते हो----हां ! यही सम्राट् बनना ही आपके साथ शोभा देता है। आपने सहज स्वभाव फ़रमाया कि न केवल सम्राट् बनना ही अच्छा है न बिल्कुल फ़कीर, हमें तो "शाहनशाही फ़कीरी' से काम है। कितने रहस्य भरे मधुर वचन थे ये। "शाहनशाही फ़कीरी' जिसे भविष्य में केवल कथनमात्र ही न रखकर कार्यरूप में परिणित किया और साथ में ही श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्णचन्द्र जी महाराज के उपदेशानुसार राजयोग का उद्घाटन कर दिया। नन्हीं कोंपलों में जो रस होता है वही फूलों और फलों में अमृत का काम करता है। बाल्यकाल की झांकियां ही किसी असाधारण भविष्य की ओर संकेत किया करती हैं।
कभी-कभी आप रात्रि के समय घर से भाग कर टीलों की ओर जाने का प्रयत्न करते। फूफी जी व पिता जी आपको बलपूर्वक पकड़कर कहते कि इस समय कौनसा खेल शेष बचा है जो पूरा नहीं हुआ। आप कुछ समय तक मौन रहते, फिर उत्तर देते कि अमुक टीले के समीप मैं सुबह कुछ भूल आया हूँ, उसे लेने के लिए जाना है। इस प्रकार कई बार आपको रात्रि के समय बाहर जाने से रोक लिया गया।
आपकी आयु लगभग छ: सात वर्ष की हुई होगी, जब आप बार-बार घर से भागने का प्रयत्न करते और आपको हर बार रोका जाता। एक दिन पिता जी के दिल में ख़्याल आया कि कौनसी ऐसी वस्तु है जिसके पीछे यह बालक इतना दीवाना बना रहता है। अब जब भी रात्रि में घर से भागे तो इसे रोकना उचित नहीं। पीछे जाकर देख लेंगे कि किस वस्तु को ढूँढ़ने जाता है। आपने फूफी जी को भी समझा दिया कि अब जब भी यह रात में बाहर जाने लगे तो इसे मत रोकना।
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